वन विभाग परिसर में लकड़ी की ठक-ठक, राजशाही ठाठ की तैयारी!
वनरक्षकों के आवास में सागौन से बन रही डाइनिंग टेबल-कुर्सियां, क्या साहबों के लिए सज रहा शाही दरबार?
आम आदमी के घर लकड़ी मिलती तो कार्रवाई की आरी चल जाती, यहां विभागीय परिसर में हथौड़े की चोट पर भी सवालों के जवाब जांच के बाद मिलेंगे!

बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद।
जंगल की लकड़ी पर किसका अधिकार है? नियमों का
, जंगल की सुरक्षा करने वाले विभाग का या फिर उन साहबों का, जिनके दफ्तर के पीछे हथौड़े की ठक-ठक के बीच राजशाही फर्नीचर तैयार होने की चर्चा है? सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के बफर जोन अंतर्गत इंदागांव रेंज के धुर्वागुड़ी कार्यालय परिसर में वनरक्षकों के आवास के पीछे सागौन की लकड़ी से फर्नीचर बनाने का काम होता दिखाई दिया।
मौके पर पहुंचे तो नजारा किसी साधारण मरम्मत कार्य से ज्यादा किसी शाही फर्नीचर वर्कशॉप जैसा नजर आया। भारी-भरकम पुरानी सागौन की लकड़ी, हथौड़े की ठक-ठक और फर्नीचर तैयार करने में जुटे दो बढ़ई! जानकारी के मुताबिक, दोनों कारीगर देवभोग क्षेत्र से बुलाए गए थे। उनके हाथों में औजार थे और सामने लकड़ी, जिससे दो डाइनिंग टेबल और आठ कुर्सियां तैयार की जा रही थीं।

अब सवाल यह है कि जंगल की लकड़ी से आखिर किसके लिए यह खास इंतजाम हो रहा था? क्या यह सामान्य विभागीय जरूरत थी, किसी अधिकारी के कार्यालय का काम था या फिर किसी के लिए राजशाही बैठक की तैयारी चल रही थी? इसका जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
साहबों की डाइनिंग टेबल निर्माण या दरवाजे-चौखट की मरम्मत?
मौके पर मौजूद बढ़ई नरेश नागेश के मुताबिक, उन्हें धुर्वागुड़ी में किसी विभागीय कर्मचारी के कहने पर फर्नीचर बनाने के लिए बुलाया गया था। हालांकि, इस काम का आदेश किस अधिकारी ने दिया, लकड़ी कहां से आई और निर्माण किस प्रयोजन के लिए कराया जा रहा था, इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी है।

जब इस विषय पर रेंजर सुशील कुमार सागर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि कार्यालय के टूटे हुए दरवाजे और चौखट की मरम्मत के लिए लकड़ी से संबंधित काम कराया जा रहा था।
लेकिन यहां सवाल खड़ा होता है कि यदि काम सिर्फ दरवाजे और चौखट की मरम्मत का था, तो फिर दो डाइनिंग टेबल और आठ कुर्सियों के निर्माण की बात क्यों सामने आई? क्या इनका निर्माण भी उसी मरम्मत कार्य का हिस्सा था? यदि हां, तो क्या इसका कोई लिखित आदेश, स्वीकृत प्रस्ताव या विभागीय रिकॉर्ड मौजूद है?

दरवाजे की मरम्मत के नाम पर डाइनिंग टेबल और कुर्सियों का हिसाब भी सामने आना चाहिए। आखिर सरकारी काम में लकड़ी का इस्तेमाल हो रहा है तो उसका हिसाब भी सरकारी रिकॉर्ड में होना चाहिए।
सागौन की लकड़ी, डिजाइन बनाने वाले मशीन, बुरादे के निशान और जांच के सवाल!
मौके पर लकड़ी के छिलके, खोद कर डिजाइन बनाने वाले मशीनों की मौजूदगी और बुरादा दिखाई देने से यह आशंका भी उठती है कि वहां फर्नीचर बनाने का काम कुछ समय से चल रहा हो सकता है। हालांकि, केवल छिलकों और बुरादे के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कितने समय से काम चल रहा था या पहले कितनी वस्तुएं बनाई गईं। डिजाइन वाले चौखट और खिड़की आज तक कोई भी ऑफिस में लगे हुए हम तो नहीं देखे हैं तो क्या रिपेयरिंग वाले चौखट और खिड़की के लिए भी आर्ट और डिजाइन वाला खिड़की चौखट लगाने का आईडिया आखिर किसका था ? यह भी जांच का विषय है । इसीलिए जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि मौके पर मौजूद सागौन की लकड़ी कहां से लाई गई थी। क्या वह जब्त की गई लकड़ी थी? क्या उसे विधिवत काष्ठागार में जमा किया गया था? क्या लकड़ी विभागीय उपयोग के लिए जारी की गई थी? और यदि ऐसा था, तो क्या उसके आवंटन एवं उपयोग से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध हैं?
वन विभाग जंगल में अवैध कटाई और लकड़ी की तस्करी रोकने के लिए कार्रवाई करता है। ऐसे में विभागीय परिसर के भीतर लकड़ी से फर्नीचर तैयार होने का मामला सामने आने पर लकड़ी के स्रोत और उसके इस्तेमाल की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
आम आदमी होता तो क्या अब तक कार्रवाई की आरी चल चुकी होती?
कल्पना कीजिए, यदि किसी आम ग्रामीण के घर या आंगन में सागौन की इतनी भारी लकड़ी पड़ी मिलती और उससे फर्नीचर बनाने का काम चल रहा होता, तो क्या उससे लकड़ी के दस्तावेज नहीं मांगे जाते? क्या लकड़ी के स्रोत की जांच नहीं होती? क्या वन अपराध प्रकरण यानी पीओआर दर्ज करने की संभावना नहीं बनती?
निश्चित रूप से, यदि अवैध रूप से वन उपज रखने या इस्तेमाल करने के साक्ष्य मिलते, तो नियमानुसार कार्रवाई का सवाल उठता।

लेकिन जब यही सवाल वन विभाग के अपने कार्यालय परिसर के पीछे सामने आए, तो जवाब जांच के बाद देने की बात कही जा रही है।
आम आदमी के लिए पहले जांच, फिर कार्रवाई या पहले कार्रवाई, फिर जांच? और विभागीय परिसर में मामला सामने आए तो पहले जांच, फिर जवाब?
यह सवाल किसी अधिकारी को पहले से दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए है।
क्योंकि कानून की असली ताकत तभी दिखाई देती है, जब उसके सामने आम नागरिक और सरकारी कर्मचारी के लिए एक जैसे मानक लागू हों।
जंगल में हाईटेक निगरानी, कार्यालय के पीछे क्या हुआ?
वन विभाग जंगलों में अवैध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आधुनिक निगरानी तकनीक, गश्त और अन्य व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करता है। लेकिन धुर्वागुड़ी कार्यालय परिसर के भीतर ही कथित तौर पर फर्नीचर निर्माण का काम चलने की जानकारी सामने आने के बाद निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यदि यह काम कई दिनों से चल रहा था, तो क्या इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को थी? यदि जानकारी थी, तो किसकी अनुमति से काम कराया जा रहा था? और यदि जानकारी नहीं थी, तो अपने ही कार्यालय परिसर के पीछे चल रहे काम से विभागीय अमला अनजान कैसे रहा?
हथौड़े की आवाज सुनकर मामला पत्रकार की नजर में आ सकता है, तो फिर विभागीय निगरानी व्यवस्था की नजर वहां तक क्यों नहीं पहुंची?
जंगल में छिपी लकड़ी खोजने वाला विभाग, अपने ही परिसर में तैयार हो रही टेबल-कुर्सियों का हिसाब खोजने में कितना समय लगाएगा?
जब्त लकड़ी का सफर काष्ठागार तक या फर्नीचर तक?
वन अपराधों में जब्त की गई लकड़ी के परिवहन, भंडारण और उपयोग की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। ऐसे में इस मामले में भी यह जांच जरूरी है कि मौके पर मौजूद सागौन की लकड़ी का जब्ती या भंडारण रिकॉर्ड से कोई संबंध है या नहीं।
क्या लकड़ी विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज है? क्या उसे किसी वैध प्रक्रिया के तहत फर्नीचर निर्माण के लिए जारी किया गया था? क्या तैयार की जा रही टेबल और कुर्सियों का कोई आधिकारिक उपयोग निर्धारित था?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की जांच, लकड़ी की पहचान और संबंधित कर्मचारियों के बयान से ही स्पष्ट हो सकेगा।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि जब्त लकड़ी का इस्तेमाल किया गया या किसी नियम का उल्लंघन हुआ। लेकिन यदि विभागीय लकड़ी का इस्तेमाल हुआ है, तो उसका पूरा हिसाब सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आना चाहिए।
उप निदेशक बोले—जांच के बाद ही बता पाऊंगा!
इस मामले में जब उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरुण कुमार जैन से चर्चा की गई, तो उन्होंने कहा कि वे सभी तथ्यों की जांच करने के बाद ही बता पाएंगे कि सागौन की लकड़ी से कार्यालय के लिए क्या बनवाया जा रहा था और कहीं यह मरम्मत का काम तो नहीं था।
उनके इस बयान के बाद अब निगाहें विभागीय जांच पर टिकी हैं।
जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि फर्नीचर निर्माण का आदेश किसने दिया, लकड़ी कहां से आई, उसका सरकारी रिकॉर्ड क्या है, दो डाइनिंग टेबल और आठ कुर्सियां किस उपयोग के लिए बनाई जा रही थीं और इस पूरे काम की अनुमति किस स्तर से दी गई थी।
यदि काम नियमों के तहत हुआ है, तो दस्तावेज सामने आने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। वहीं, यदि जांच में किसी तरह की अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल—जंगल की लकड़ी पर नियमों का राज या साहबों का राज?
वन विभाग का काम जंगल और वन संपदा की रक्षा करना है। ऐसे में विभागीय परिसर के पीछे सागौन की लकड़ी से फर्नीचर तैयार होने का मामला केवल टेबल-कुर्सियों तक सीमित नहीं है। यह विभागीय पारदर्शिता, लकड़ी के उपयोग और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था से जुड़ा सवाल भी है।
यदि यह सब विधिवत अनुमति और रिकॉर्ड के अनुसार हो रहा था, तो विभाग को इसकी जानकारी और दस्तावेज सामने रखने चाहिए। और यदि नियमों के विपरीत कुछ हुआ है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दो डाइनिंग टेबल और आठ कुर्सियां किसके लिए बन रही थीं। असली सवाल यह है कि जंगल की लकड़ी का हिसाब रखने वाले विभाग में लकड़ी से बन रही हर वस्तु का हिसाब कौन रख रहा है?
फिलहाल मशीनों के गर्जना और हथौड़े की ठक-ठक थमे या जारी रहे, सवालों की आवाज जरूर उठ चुकी है। अब देखना यह है कि जांच में सच सामने आता है या फिर मामला दरवाजे और चौखट की मरम्मत बताकर फाइलों के भीतर ही समेट दिया जाता है।
BKM NATIONAL NEWS का सवाल स्पष्ट है—वन संपदा की रक्षा करने वाले विभाग में यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो हिसाब सामने आने में देरी क्यों? और यदि नियम टूटे हैं, तो कार्रवाई किस पर होगी?

