बड़ी खबर: बीजापुर वन मंडल में बिगड़े वनों के सुधार के नाम पर करोड़ों के गबन का आरोप!
भैरमगढ़ रेंज में वर्ष 2025 के कार्यों पर उठे सवाल, आर डी एफ योजना की राशि डकारने तथा लीपापोती के लगे आरोप
बीजापुर/भैरमगढ़ बस्तर के माटी। छत्तीसगढ़ प्रदेश में सबसे बड़ा बीजापुर वन मंडल के अंतर्गत भैरमगढ़ वन परिक्षेत्र में बिगड़े वनों के सुधार योजना के तहत वर्ष 2025 में कराए गए कार्यों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि योजना के तहत लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के कार्य कागजों पर दर्शाकर राशि निकाल ली गई, जबकि संबंधित वन क्षेत्रों में वास्तविक कार्य नहीं कराया गया। मामले में ग्रामीणों के लिखित बयान सामने आ रही है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह सरकारी राशि के दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है।
तीन बीट में से एक में ही सीमित कार्य का आरोप
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सतवा सर्किल के अंतर्गत आने वाले तीन बीट में वर्ष 2025 के दौरान बिगड़े वनों के सुधार योजना के कार्य प्रस्तावित थे। आरोप है कि केवल सतवा बीट में कुछ सीमित कार्य कराकर औपचारिकता पूरी की गई, जबकि बड़े पल्ली बीट के कक्ष क्रमांक 410 तथा कक्ष क्रमांक 434 और 426 में कोई कार्य नहीं कराया गया।

लगभग तीन करोड़ रुपये के कार्यों पर सवाल
योजना के अंतर्गत लेंटाना सफाई, लूज बोल्डर चेकडैम, एससीटी (SCT), एमपीटी (MPT), सीपीटी (CPT) के तहत पशु अवरोधक नाली तथा सीबीओ (Cut Back Operation) जैसे कार्यों का उल्लेख किया जा रहा है। आरोप है कि इन कार्यों के नाम पर लगभग तीन करोड़ रुपये खर्च दर्शाए गए, जबकि संबंधित स्थलों पर कार्यों की वास्तविक स्थिति शून्य है। जिसकी पड़ताल पत्रकारों ने किया।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि कार्य वास्तव में नहीं हुए, तो मजदूरों के नाम पर वाउचर कैसे तैयार किए गए और भुगतान किस आधार पर किया गया? हालांकि, इन आरोपों और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की जाए तो सारे वन कर्मियों तथा अधिकारियों से वसूली की कार्रवाई हो सकती है।
ग्रामीणों के लिखित बयान से भ्रष्टाचार की खुली पोल
स्थानीय ग्रामीणों द्वारा लिखित बयान दिया हैं ग्रामीणों का दावा है कि उनके गांवों से लगे जंगलों में वन विभाग ने संबंधित योजना के तहत कोई काम नहीं कराया। यदि इन बयानों और विभागीय अभिलेखों का मिलान कराया जाए, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र का हवाला देकर अनियमितता?
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों के भौतिक सत्यापन में आने वाली कठिनाइयों के बीच यह मामला और गंभीर हो जाता है। सवाल उठ रहा है कि क्या क्षेत्र की दुर्गमता का फायदा उठाकर कार्यों की वास्तविक स्थिति छिपाई गई? इसकी पुष्टि केवल निष्पक्ष जांच और स्थल निरीक्षण से ही हो सकेगी।
2026-27 में फिर उसी क्षेत्र में लगभग तीन करोड़ के कार्य
मामले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026-27 में भी बिगड़े वनों के सुधार योजना के तहत इन्हीं बीटों में लगभग तीन करोड़ रुपये के कार्य कराए जाने की बात सामने आ रही है। ऐसे में जरूरी है कि पिछले वर्ष के कार्यों का सत्यापन कराए बिना नई राशि के उपयोग पर सवालों को नजरअंदाज न किया जाए।
वन विभाग की चुप्पी, जांच की मांग
मामले में संबंधित वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। आरोपों के संबंध में बीट गार्ड, डिप्टी रेंजर, रेंजर और एसडीओ स्तर तक कुछ भी कहने से परहेज़ करने लगे हैं। हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की संलिप्तता जांच के निष्कर्ष के बाद ही स्थापित होगी।
मामले को लेकर मुख्य वन संरक्षक, रायपुर तथा मुख्यमंत्री जनदर्शन में शिकायत करने की तैयारी की जा रही है। शिकायत के बाद संबंधित अभिलेखों की जांच, मजदूरों की उपस्थिति और भुगतान का सत्यापन तथा सभी कार्यस्थलों का भौतिक निरीक्षण कराया जाने की मांग की जाएगी।
जांच के लिए उठ रहे पांच बड़े सवाल
वर्ष 2025 में स्वीकृत कार्यों पर वास्तव में कितना खर्च हुआ?
कक्ष क्रमांक 410, 434 और 426 में कराए गए कार्यों का भौतिक प्रमाण क्या है?
मजदूरों के नाम पर तैयार वाउचर और भुगतान अभिलेखों का सत्यापन किसने किया?
कार्यों की गुणवत्ता और वास्तविक स्थिति की जांच किस अधिकारी ने की?
वर्ष 2026-27 में उसी क्षेत्र में प्रस्तावित कार्यों से पहले पिछले कार्यों का सत्यापन क्यों न कराया जाए?
संबंधित योजना के सभी स्वीकृति आदेश, माप पुस्तिका (एमबी), मस्टर रोल, मजदूरी भुगतान विवरण, बिल-वाउचर और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्रों की जांच कराई जाए। साथ ही स्वतंत्र टीम से स्थलीय सत्यापन कराकर, अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार ठोस कार्रवाई और शासकीय राशि की वसूली की कार्रवाई होनी चाहिए ताकि नक्सलियों के नाम पर वर्षों से किए भ्रष्टाचार का खुलासा हो।

