अमलीपदर में जनता कम, कुर्सियां ज्यादा… और नेताओं के गुस्सा सबसे ज्यादा!
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), अमलीपदर
सरकार का दावा था—“सुशासन घर-घर पहुंचेगा”…
लेकिन अमलीपदर में जो दृश्य दिखाई दिया, उसमें सुशासन से ज्यादा “खाली कुर्सियां” जनता का स्वागत करती नजर आईं। मंच बड़ा था, भाषण लंबे थे, विभागों के स्टॉल चमचमा रहे थे… बस जनता कम थी।
हालात ऐसे थे कि जितने विभागों के स्टॉल लगाए गए थे, उससे कम लोग मैदान में मौजूद दिखे। कुर्सियां धूप सेंक रही थीं और नेता मंच से जनता खोज रहे थे।

इसी बीच पूर्व संसदीय सचिव गोवर्धन मांझी का गुस्सा मंच पर फूट पड़ा। उन्होंने सीधे अधिकारियों और कलेक्टर पर फोन नहीं उठाने का आरोप लगाते हुए कहा—
“छोटी-छोटी समस्याएं फोन उठाने से हल हो जाती हैं, लेकिन अफसर फोन ही नहीं उठाते… फिर जनता जनप्रतिनिधियों को घेरती है।”
उनकी नाराजगी सुनकर मैदान में बैठे लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से समर्थन भी दे डाला।
माहौल ऐसा था मानो “जन समस्या समाधान शिविर” अचानक “जनप्रतिनिधि शिकायत निवारण शिविर” बन गया हो।
उधर कांग्रेस नेताओं संजय नेताम, सेवन पुजारी और पंकज माझी ने पूरे आयोजन को “ढकोसला तिहार” करार दे दिया।

कांग्रेस नेता संजय नेताम ने तो सीधे सरकारी सामग्री की गुणवत्ता पर सवाल दाग दिया। खासकर इलेक्ट्रॉनिक ट्राई साइकिल को लेकर बोले—
“सरकार ने दिव्यांगों को ट्राई साइकिल दी जरूर, लेकिन हालत ऐसी कि दो किलोमीटर चलने के बाद खुद ट्राई साइकिल भी आराम मांगने लगती है।”

वहीं भाजपा नेताओं ने मंच से योजनाओं की उपलब्धियां गिनाईं।
जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने इसे “दूरगामी परिणाम देने वाला तिहार” बताया और अधिकारियों को आवेदन तुरंत निपटाने के निर्देश दिए।

वरिष्ठ भाजपा नेता बोधन नायक सरकार के गुणगान में व्यस्त दिखे और भूरी-भूरी प्रशंसा कर डाली जबकि सरपंच संघ अध्यक्ष हलमन ध्रुवा ने योजनाओं का भविष्य सुनाया।
लेकिन जनता के मन में सवाल वर्तमान का था—
“पिछले साल दिए आवेदन का क्या हुआ?”
चार दिन पहले पंचायतों से लिए गए आवेदन थे 823, जबकि शिविर में नए आवेदन आए 300।
तुरंत समाधान का आंकड़ा बताया गया 482।
बाकी आवेदन शायद अगले “सुशासन तिहार” तक लोकतांत्रिक तपस्या में रहेंगे।
सबसे बड़ा “सुशासन क्षण”_जब सरपंचों को खाने की टेबल से उठाया गया!
कार्यक्रम का सबसे चर्चित दृश्य तब सामने आया जब भोजन व्यवस्था के दौरान खरी पथरा के सरपंच पुनीत राम नागेश और आयोजन स्थल नयापारा के सरपंच ध्रुव सिंह ऊटी को नेताओं और अफसरों के सामने खाने का प्लेट और पानी गिलास देने के बाद डाइनिंग टेबल से हीं उठा दिया गया। बिना खाना खाए भरी गर्मी में, भूखे पेट घर लौटना पडा। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
आरोप लगा कि 15 पंचायतों से ₹9000 तक चंदा लिया गया, लेकिन बदले में “एक गिलास पानी भी नसीब नहीं हुआ।” पिछले साल यह चंदा 10000 रुपया था । नाराज सरपंचों का दर्द चेहरे पर साफ नजर आ रहा था—उनका कहना था_
“चंदा देते समय हम याद आते हैं, लेकिन खाना खाते समय कुर्सी खाली करवाकर उठा दिया जाता है।”
यानी गांव में कार्यक्रम भी आपका… चंदा भी आपका… और बेइज्जती भी बोनस में!
मामले को शांत कराने की कोशिश में अधिकारियों ने “महिला सम्मान” का तर्क दिया, लेकिन सवाल फिर भी मंच के नीचे घूमता रहा—
“क्या हर सुशासन तिहार पंचायतों के चंदे से चलता है?”
अगर सरकार का बजट है… तो फिर पंचायतों से वसूली क्यों?
और अगर पंचायतों का पैसा है… तो फिर सरपंचों को थाली से क्यों हटाया गया?

उधर गोवर्धन मांझी ने पुलिस जांच के नाम पर वसूली का मुद्दा भी उठा दिया।उन्होंने आरोप लगाया कि हर चौक-चौराहे पर जांच के नाम पर लोगों को परेशान किया जा रहा है।
पूर्व सरपंच सेवन सिंह पुजारी ने खाद संकट और किसानों की परेशानियां गिनाईं। वहीं नल-जल मिशन पर सवाल उठे तो जवाब मिला—
“जल्द सुधार होगा…”
लेकिन जनता पूछ रही थी—
“गर्मी खत्म होने के बाद पानी आएगा तो प्यास किस मौसम में बुझाई जाएगी?”
कुल मिलाकर अमलीपदर का “सुशासन तिहार” जनता के मन में उतना असर नहीं छोड़ पाया, जितना मंच से भाषणों में बताया गया।
यहां लोगों को योजनाओं से ज्यादा खाली कुर्सियां याद रहीं…
और सरपंचों को “डाइनिंग टेबल लोकतंत्र”।

