सरकारी योजनाएं कागजों पर दौड़ीं, लेकिन कमार पारा तक पहुंचते-पहुंचते हो रहा है बेहोश !
प्रसव पीड़ा से कराहती महिला को नहीं मिली 102 की सुविधा, परिजनों ने खाट पर लादकर करीब 3 किलोमीटर पैदल तय किया रास्ता; नदी किनारे खड़ी निजी अर्टिगा बनी आखिरी उम्मीद
बस्तर के माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEW S),गरियाबंद
गरियाबंद। सरकार आदिवासी परिवारों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए योजनाओं की झड़ी लगा रही है। कहीं जनमन योजना के जरिए विशेष पिछड़ी जनजातियों के जीवन में बदलाव लाने के दावे हैं, तो कहीं बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और परिवहन की सुविधाएं पहुंचाने के वादे। लेकिन इन दावों की असली परीक्षा तब होती है, जब किसी सुदूर वनांचल में रहने वाली गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होती है और अस्पताल तक पहुंचने के लिए एंबुलेंस के बजाय खाट का सहारा लेना पड़ता है।

गरियाबंद जिले के ग्राम पंचायत घुमरा पदर के कमार पारा में रहने वाली कमार जनजाति की महिला दूतिका के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। प्रसव पीड़ा शुरू हुई तो न समय पर 102 एंबुलेंस की सुविधा मिल पाई और न ही कोई दूसरी सरकारी परिवहन व्यवस्था। आखिरकार परिवार के लोगों और मितानिन ने जिम्मेदारी संभाली। महिला को खाट पर लिटाकर करीब तीन किलोमीटर तक पैदल ले जाया गया। नदी किनारे पहले से मौजूद एक निजी अर्टिगा वाहन में उसे बैठाकर स्वास्थ्य केंद्र रुमाल पहुंचाया गया, जहां महिला ने सुरक्षित रूप से एक बेटे को जन्म दिया।
मां और नवजात के सुरक्षित होने की खबर राहत जरूर देती है, लेकिन इस घटना ने व्यवस्था के सामने कई असहज सवाल भी खड़े कर दिए हैं। क्या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए सरकारी व्यवस्था से पहले परिवार की मजबूरी और ग्रामीणों के कंधों को आगे आना पड़ेगा?
जब एंबुलेंस नहीं पहुंची, तब खाट बनी जीवनरेखा!
कमारपारा के जंगलों में बसे इस परिवार के लिए सड़क और परिवहन की समस्या कोई नई बात नहीं है। नदी-नालों के बीच बसे होने के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी ग्राम पंचायत घुमरापदर तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। राशन हो या दूसरी जरूरी सुविधाएं, रास्ते की बाधाएं अक्सर ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा देती हैं।

लेकिन जब मामला गर्भवती महिला और प्रसव पीड़ा का हो, तब यही दुर्गम रास्ते जानलेवा जोखिम में बदल सकते हैं। दूतिका के मामले में परिजनों और मितानिन ने हिम्मत दिखाई, खाट उठाई और पैदल ही अस्पताल की राह पकड़ ली। नदी किनारे निजी वाहन मिल गया और महिला स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच सकी।
लेकिन सवाल यह है कि अगर नदी किनारे निजी गाड़ी मौजूद नहीं होती, तो क्या होता? क्या उस दिन भी किसी परिवार को अपनी किस्मत के भरोसे मरीज को खाट पर ढोना पड़ता? और अगर रास्ते में कोई अनहोनी हो जाती, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होती?
योजनाओं की चमक बनाम जमीन की हकीकत!
विशेष पिछड़ी जनजातियों के विकास के लिए सरकार प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) जैसी योजनाएं चला रही है। इनका उद्देश्य ऐसे समुदायों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना है, जो लंबे समय से विकास की मुख्यधारा से दूर हैं।

लेकिन कमार पारा की तस्वीर यह सोचने पर मजबूर करती है कि योजनाओं का लाभ आखिरी छोर पर बसे परिवारों तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है। यदि किसी गांव तक बरसात में पहुंचना मुश्किल हो, मरीज को अस्पताल ले जाने के लिए पक्के रास्ते का अभाव हो और आपात स्थिति में एंबुलेंस की सुविधा न मिल पाए, तो विकास के दावों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
सरकारी योजनाओं की सफलता केवल स्वीकृति, बजट या निर्माण के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। असली सफलता तब होगी, जब किसी आदिवासी मां को प्रसव के दौरान खाट पर लादकर नदी पार कराने की नौबत न आए।
आखिर कब तक खाट पर ढोया जाएगा विकास?
दूतिका और उसके नवजात के सुरक्षित होने से इस बार राहत मिली। लेकिन हर परिवार की किस्मत इतनी अच्छी हो, इसकी गारंटी कौन देगा? हर प्रसव सुरक्षित नहीं होगा, हर बार नदी किनारे निजी वाहन नहीं मिलेगा और हर बार परिजन समय पर अस्पताल तक पहुंच ही जाएंगे, यह मान लेना भी खतरनाक है।
कमारपारा के ग्रामीणों की मुश्किलें केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि सड़क, स्वास्थ्य सुविधा और परिवहन से जुड़ी बुनियादी जरूरतों की ओर इशारा करती हैं। ऐसे में प्रशासन और संबंधित विभागों को यह देखना होगा कि इस इलाके में बारहमासी सड़क, नदी-नालों पर सुरक्षित आवागमन, आपातकालीन स्वास्थ्य परिवहन और गर्भवती महिलाओं के लिए समय पर चिकित्सा सहायता की व्यवस्था कैसे सुनिश्चित की जाए।
व्यंग्य तो यही है कि सरकार विकास को गांव-गांव पहुंचाने की बात करती है, लेकिन यहां विकास को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए भी खाट की जरूरत पड़ रही है।
अब सवाल जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, लोक निर्माण विभाग और जनजातीय विकास से जुड़े अधिकारियों से है—क्या कमारपारा तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के लिए किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार किया जाएगा? क्या पीएम-जनमन जैसी योजनाओं के जरिए इस सुदूर बस्ती तक सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित होगी? या फिर बरसात आते ही नदी-नालों के साथ सरकारी सुविधाओं का रास्ता भी बंद हो जाएगा?
क्योंकि विकास का असली पैमाना यह नहीं कि सरकार कितनी योजनाएं चला रही है, बल्कि यह है कि जरूरत पड़ने पर सबसे दूर बसे नागरिक तक सुविधा कितनी जल्दी पहुंच रही है।
दूतिका ने बेटे को जन्म दिया है, लेकिन कमारपारा की यह घटना व्यवस्था से एक बड़ा सवाल पूछ रही है—आखिर कब तक आदिवासी परिवारों के लिए एंबुलेंस से पहले खाट और सरकारी व्यवस्था से पहले मजबूरी पहुंचेगी?

