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बिखरे बाल…बिना कंघी….. चेहरे पर दर्द… और दर्द ने ढहा ममता के किला !
रत्ना देवनाथ की अनसुनी कहानी.….

“मैं कसम खाती हूं… जब तक मेरी बेटी को इंसाफ नहीं मिलेगा, मैं अपने बालों में कंघी नहीं करूंगी…”
यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था… यह एक मां की टूटी हुई दुनिया का उद्घोष था… और राजनीति के मंच पर चढ़ते-चढ़ते यह एक भावनात्मक ब्रांड बन गया।


यह कहानी है रत्ना देवनाथ की—
एक ऐसी महिला, जिसे पहले सिस्टम ने तोड़ा… और फिर उसी सिस्टम ने उसे विधायक बना दिया। सवाल बस इतना है—यह जीत न्याय की है या रणनीति की?


चुनाव प्रचार के दौरान तस्वीरें कुछ अलग थीं—
बिखरे बाल… बिना कंघी… चेहरे पर दर्द… और जनता के बीच एक जीवंत प्रतीक।


लोग आते… कोई बालों को सहलाता… कोई आशीर्वाद देता…जैसे चुनाव नहीं, एक भावनात्मक आंदोलन चल रहा हो।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक पुराना बयान फिर गूंज उठा—
ममता बनर्जी का वो विवादित सवाल—
लड़कियां घर से निकलती ही क्यों हैं?”


अब जनता पूछ रही थी—
“क्या इंसाफ मांगने के लिए भी घर में बैठना चाहिए?”और फिर नतीजे आए…
किला ढह गया। ममता का गढ़ टूटा… लेकिन सवाल अभी भी खड़ा है—
क्या यह सत्ता परिवर्तन है… या सिर्फ सहानुभूति का परिणाम?

यह पहली बार नहीं है जब दर्द ने चुनाव जिताया हो।
छत्तीसगढ़ की साजा विधानसभा याद कीजिए—जहां ईश्वर साहू, एक साधारण मजदूर और रिक्शा चालक, विधायक बने।


उनकी कहानी भी दर्द से शुरू हुई… और जनता ने उन्हें उम्मीद बनाकर सत्ता तक पहुंचाया। लेकिन आज साजा के गांवों में जाकर पूछिए—
क्या बदली है तस्वीर?
क्या गरीब की थाली भरी?
या सिर्फ नेता की कुर्सी मजबूत हुई?


सड़कें अब भी धूल उड़ाती हैं… और उम्मीदें अब भी इंतजार करती हैं।
यही वो मोड़ है जहां राजनीति और संवेदना का फर्क धुंधला पड़ जाता है।
क्या पार्टियां अब दर्द खोजती हैं?
क्या चेहरे नहीं, कहानियां चुनाव जीतती हैं? और क्या जनता हर बार भावनाओं में बहकर वही गलती दोहराती है?

इतिहास भी कुछ ऐसा ही कहता है—
महाभारत में द्रौपदी ने कसम खाई थी—
जब तक दुशासन के खून से अपने केश नहीं धोऊंगी…”
वो कसम एक युद्ध बन गई… एक महाभारत छिड़ गया… और अंत में साम्राज्य बदल गया।

आज रत्ना देवनाथ की कसम भी वैसी ही प्रतीत होती है—एक व्यक्तिगत दर्द… जो राजनीतिक युद्ध बन चुका है।
पर फर्क सिर्फ इतना है—महाभारत में न्याय के बाद युद्ध खत्म हुआ था…
राजनीति में जीत के बाद भी सवाल खत्म नहीं होते।
अब असली परीक्षा शुरू होती है—
क्या रत्ना देवनाथ सिस्टम को बदलेंगी?
या सिस्टम उन्हें बदल देगा?
क्या उनका बिखरा हुआ बाल न्याय का प्रतीक रहेगा…या सत्ता के गलियारों में सुलझ जाएगा?

दर्द ने सत्ता तो दिला दी… अब देखना ये है—वो न्याय लाएंगी… या सिर्फ राजनीति निभाएंगी।”

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