बाघों की सुरक्षा में सड़क पर पहरा लेकिन इंसानी जिंदगी की सुरक्षा का जिम्मेदार कौन ?
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
विशेष जनहित रिपोर्ट
जंगल बुक का मोगली याद आया! क्या अब जंगल में ही जन्म लेंगे बच्चे?
बाघों की सुरक्षा में सड़क पर पहरा, लेकिन इंसानों की जिंदगी भगवान भरोसे! तौरेंगा बैरियर के पास अंधेरे में गर्भवती महिला का प्रसव, जच्चा-बच्चा सुरक्षित; सवाल—क्या वनांचल के लोगों को अब जंगल में रहने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी?
बाघों का जंगल में विचरण जरूरी, लेकिन इंसानों का रास्ता क्यों बंद? बाघ स्थायी नहीं, मगर प्रतिबंध स्थायी क्यों?
रात 7 से सुबह 6 बजे तक सड़क बंद, यात्रियों के लिए न अस्पताल, न भोजन, न विश्राम! न्यायालय और प्रशासन से नियमों पर पुनर्विचार की उठी मांग।

टीवी पर कभी जंगल बुक का मोगली देखा होगा। जंगल में जानवरों के बीच पलता-बढ़ता मोगली और उसके साथी बघीरा, बालू और शेरखान की कहानियां बच्चों को खूब रोमांचित करती हैं। लेकिन क्या उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में आने वाले दिनों में जंगल बुक का यह दृश्य हकीकत बनने वाला है? क्या अब जंगल के बैरियर पर ही बच्चों का जन्म होगा और यात्री सुबह होने तक मोगली की तरह जंगल में रहने की ट्रेनिंग लेंगे?

यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि मंगलवार-बुधवार की दरम्यानी रात करीब 2 बजे तौरेंगा फॉरेस्ट चेक पोस्ट के पास घनघोर अंधेरे में एक गर्भवती महिला का प्रसव हो गया। महिला रायपुर से देवभोग जा रही थी। रात्रिकालीन यातायात प्रतिबंध के कारण यात्री बस तौरेंगा और इंदागांव के बीच फंसी हुई थी। इसी दौरान महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हुई और बैरियर के पास ही बच्चे का जन्म हो गया।
राहत की बात यह रही कि बस यात्रियों और परिचालक ने संवेदनशीलता दिखाते हुए महतारी एक्सप्रेस को सूचना दी। वाहन मौके पर पहुंचा और जच्चा-बच्चा को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मैनपुर पहुंचाया गया। दोनों सुरक्षित बताए जा रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जिस बच्चे का जन्म अस्पताल में सुरक्षित होना चाहिए था, उसे जंगल के बैरियर पर दुनिया में आने के लिए मजबूर होना पड़ा। अगर प्रसव में कोई जटिलता आ जाती तो क्या शेरखान और बालू अस्पताल पहुंचाने आते? या फिर मोगली की जंगल बुक से ही इलाज का इंतजाम करना पड़ता?
यह कोई मनोरंजन का दृश्य नहीं, बल्कि वनांचल की उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहां बाघों के लिए रास्ते सुरक्षित हैं और इंसानों के लिए इंतजार!
बाघों का आवागमन अस्थायी, प्रतिबंध स्थायी क्यों?
स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में शाम 7 बजे से सुबह 6 बजे तक यात्री और वाणिज्यिक वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध है। यानी 11 घंटे तक रायपुर-देवभोग मार्ग से गुजरने वाले यात्रियों को तौरेंगा और इंदागांव बैरियर के आसपास रुकना पड़ता है।
यह मार्ग अमलीपदर, मैनपुर और देवभोग सहित वनांचल के हजारों लोगों की जीवनरेखा है। इसी रास्ते से विद्यार्थी, मरीज, गर्भवती महिलाएं, नौकरीपेशा लोग और व्यापारी आवागमन करते हैं। लेकिन रात होते ही इनकी मंजिल से पहले बैरियर आ जाता है।

विडंबना देखिए, जंगल में बाघों की मौजूदगी और उनके विचरण को ध्यान में रखकर यातायात प्रतिबंधित किया गया है। स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि जब बाघों का आवागमन क्षेत्र और समय बदल सकता है, तो क्या नियमों में भी वैज्ञानिक आधार पर समयानुसार बदलाव नहीं हो सकता?
क्या जिन क्षेत्रों और समय में वन्यजीवों की वास्तविक आवाजाही दर्ज होती है, उन्हीं परिस्थितियों के अनुसार प्रतिबंध लागू नहीं किया जा सकता? क्या शेष समय में सड़क को आवागमन के लिए खुला रखने की संभावना पर विचार नहीं होना चाहिए?
लोगों का कहना है कि न्यायालय के आदेश और वन्यजीव संरक्षण का सम्मान जरूरी है, लेकिन इस व्यवस्था की व्यावहारिकता और आम नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए न्यायालय से भी पुनर्विचार की मांग की जानी चाहिए।
बैरियर पर बाघों की सुरक्षा, यात्रियों की सुविधा का ठिकाना कहां?
जब 11 घंटे तक यात्रियों को रुकना पड़ता है, तो दोनों नाकों पर कम से कम पेयजल, भोजन, शौचालय, रोशनी और सुरक्षित विश्राम की व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? गर्भवती महिला, गंभीर मरीज या दुर्घटना की स्थिति में तत्काल अस्पताल पहुंचाने के लिए 24 घंटे एंबुलेंस और चिकित्सा सहायता का इंतजाम क्यों नहीं है?
प्रमुख मांगें हैं कि तौरेंगा और इंदागांव दोनों बैरियरों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अथवा आपातकालीन चिकित्सा सुविधा, एंबुलेंस, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए प्रतीक्षालय तथा भोजन-पानी की व्यवस्था की जाए। गंभीर आपातकाल में वन विभाग की अनुमति से तत्काल आवागमन का स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाया जाए।
व्यवस्था से सीधे सवाल!
_क्या अब वनांचल के लोगों को इलाज के बजाय जंगल में प्रसव की तैयारी रखनी होगी?
_बाघों की सुरक्षा के लिए प्रतिबंध है, तो यात्रियों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी किसकी है?
_क्या वन विभाग ने कभी रातभर बैरियर पर फंसे यात्रियों की वास्तविक परेशानी देखी है?
_वन्यजीवों की आवाजाही के वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर प्रतिबंध के समय और क्षेत्र की समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?
_क्या जिला प्रशासन, वन विभाग और स्वास्थ्य विभाग मिलकर दोनों नाकों पर स्थायी आपातकालीन व्यवस्था बनाएंगे?
अंत में सवाल—जंगल बुक देखना है या जंगल में जिंदगी बितानी है?
यह लड़ाई बाघों और इंसानों के बीच नहीं है। बाघों का संरक्षण भी जरूरी है और वनांचल के नागरिकों का जीवन, स्वास्थ्य तथा सुरक्षित आवागमन भी।
मकसद ऐसा रास्ता निकालना है, जहां शेरखान भी सुरक्षित रहे, बघीरा भी बेखौफ विचरण करे, बालू का प्राकृतिक आवास भी बचा रहे और इंसानों को भी अपने घर पहुंचने के लिए सुबह 6 बजे तक बैरियर पर कैद न रहना पड़े।
क्योंकि जंगल बुक टीवी पर अच्छी लगती है, लेकिन जंगल में अस्पताल के बिना बच्चे पैदा होना किसी मनोरंजन की कहानी नहीं, व्यवस्था की गंभीर विफलता का सवाल है।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार तंत्र इस घटना से सबक लेकर व्यवस्था सुधारता है या वनांचल के लोगों को अगली बार भी मोगली की कहानी का हिस्सा बनकर सुबह होने का इंतजार करना पड़ेगा यार रात भर वहीं पर बड़े स्क्रीन का इंतजाम करके बस के किनारे लाइव मोगली का जन्म सो दिखाते रहेगा?

