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गौशालाओं की बदहाली से उजागर हुई सरकारी योजनाओं की असलियत, अब पानी की भी भारी किल्लत

ग्राम पंचायतों में करोड़ों की लागत से बनी गौशालाएं बनी लावारिस, गर्मी में गोवंश पानी को तरस रहे

अमलीपदर_ गरियाबंद
“गौमाता किसी पार्टी की नहीं होती”—इस नारे को चरितार्थ करते हुए पूर्ववर्ती भूपेश बघेल सरकार ने हर पंचायत में गौशालाओं का निर्माण कराया था। इस योजना का उद्देश्य था गोवंशों की सुरक्षा व संवर्धन। गोबर खरीदी जैसी पहल ने राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना पाई थी, लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन में हुए भ्रष्टाचार ने इस पूरे प्रयास को गर्त में ढकेल दिया।

वर्तमान में छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है, जो सदैव गाय संरक्षण का दम भरती है, मगर ज़मीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। गांव-गांव में बने गौशालाएं अब वीरान हैं, जहां पहले गोवंश एकत्र होते थे, वहीं पे अब झाड़ियां उग आई हैं। पानी की टंकियां सूखी पड़ी हैं, बोरिंग खराब हो चुके हैं और कहीं-कहीं तो पाइप तक टूटे पड़े हैं।

कई गौशालाएं बनीं अवैध गतिविधियों का अड्डा


कुछ स्थानों पर गौशालाओं में ताश और जुए के अड्डे चल रहे हैं। घुमरापदर के गौशाला में लाल ईंट बनाने का अवैध कार्य चल रहा है, जो कभी गोवंशों के लिए एकत्र होने और पानी पीने की जगह हुआ करता था आज  वहां लोग अबेद्य तरीके से लाल ईट का भट्टी बनाकर कब्जा जमाए बैठे है ।

उदाहरणस्वरूप कुछ पंचायतों की स्थिति:

  • सरना बहाल: गौशाला जंगल में तब्दील, नल चालू पर टंकी में पानी नहीं।
  • भैंसमुड़ी: बौर अंदर से घस चुका है , उपयोग शून्य।
  • कोदोभाटा: बरसात में लकड़ी संग्रह का अड्डा। बौर का निजी उपयोग
  • खोकमा : निर्माण में दरारें, बोर खराब, पाइप क्षतिग्रस्त।
  • कुहीमाल: निर्माण सामग्री अब तक टंकी में पड़ी है, उपयोग नहीं के बराबर।
  • बीरी घाट , नयापारा, उरमाल,सरगी गुड़ा, भेजी पदर, गुरुजी भाटा, गोला माल जैसे और कई पंचायत का गौशाला का हाल भी ठीक इस तरह का है जैसे ऊपर में दर्शाया गया कुछ गांव का ।

कुछेक जगह जैसे उसरी जोर, वहां स्थानीय लोगों ने पहल कर पानी को डाबरी में छोड़ा है ताकि मानव और पशु दोनों को राहत मिल सके। लेकिन ऐसे प्रयास गिनती के हैं।

सरकार को संज्ञान लेने की जरूरत
गर्मी में जहां पानी की किल्लत से इंसान और जानवर दोनों जूझ रहे हैं, वहीं पहले से स्थापित इन संरचनाओं का उपयोग न होना चिंता का विषय है। सरकार द्वारा बार-बार जल संकट से निपटने की बात कही जाती है, लेकिन जमीनी हालात इसके उलट हैं।

निष्कर्ष_

लगभग 75000 से डेढ़ लाख रुपया खर्च कर खोदे गए बोरवेल और गौशालाओं की बदहाली यह साबित करती है कि केवल निर्माण से नहीं, बल्कि उसके नियमित रखरखाव और निगरानी से ही योजनाएं सफल होती हैं। सरकार को चाहिए कि इन मुद्दों का गंभीरता से संज्ञान ले, बंद पड़ी टंकियों व बोरों को शीघ्र चालू करवाए ताकि गोवंश और ग्रामीण, दोनों को इस गर्मी से राहत मिल सके।


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