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बस्तर : शांति या संसाधनों का पुनः उपनिवेशीकरण?

जगदलपुर बस्तर के माटी समाचार 

बस्तर संभाग में नक्सलवाद–माओवाद के कमजोर पड़ने के साथ शांति की उम्मीदें जगी हैं, किंतु यह शांति किसके लिए और किस कीमत पर—यह प्रश्न आज सबसे अधिक प्रासंगिक हो गया है।

 

इतिहास साक्षी है कि जब भी किसी क्षेत्र में संघर्ष समाप्त होता है, तो सबसे पहले वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर बाहरी शक्तियों की दृष्टि पड़ती है। आज बस्तर में भी यही आशंका गहराती जा रही है कि शांति की आड़ में जल, जंगल और जमीन को समुदाय से छीनकर निजी हितों के हवाले किया जा रहा है।

 

संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत संरक्षित होने के बावजूद बस्तर के मूलनिवासी समुदाय निर्णय प्रक्रिया से लगातार बाहर रखे जा रहे हैं। ग्रामसभा, समुदायिक सहमति और पारंपरिक अधिकारों को औपचारिकता में बदल दिया गया है। यह स्थिति न केवल संवैधानिक भावना के विपरीत है, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

 

1949–1950 के बाद हुए सामाजिक वर्गीकरण ने बस्तर की सामूहिक शक्ति को कमजोर किया। आज उसी कमजोरी का लाभ उठाकर संसाधनों का केंद्रीकरण किया जा रहा है। यदि समय रहते इस प्रक्रिया को नहीं रोका गया, तो बस्तर का भविष्य विकास नहीं, बल्कि विस्थापन और असमानता की कहानी बन जाएगा।

 

अब आवश्यकता है कि शांति को केवल सुरक्षा के चश्मे से नहीं, बल्कि संवैधानिक न्याय, सामुदायिक अधिकार और आत्मसम्मान के दृष्टिकोण से देखा जाए। क्योंकि शांति तभी सार्थक होगी, जब बस्तर का मूलनिवासी अपने ही जल, जंगल और जमीन पर निर्णायक भूमिका में होगा।

 

— बस्तर माटी पुत्र

महेश स्वर्ण “एबोरिजिनल ट्राइब्स!”

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