देश भर हड़ताल… अंदर बिक्री चालू! थाना रोड पर अवैध मेडिकल स्टोर ने मेडिकल बंदी को कर दिया पंचर और बना दिया मजाक
अमलीपदर में ‘अंडरग्राउंड फार्मेसी’ का खुला खेल, थाना रोड बना ‘सीक्रेट मेडिकल कॉरिडोर’ । अवैध मेडिकल स्टोर का ‘सीक्रेट ऑपरेशन’ जारी
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
देशभर में मेडिकल स्टोर बंद…12 लाख से ज्यादा दवा दुकानें हड़ताल पर…ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन रैली निकाल कर खुश हो रही थी…और इधर अमलीपदर के थाना रोड पर परस राम सिन्हा के“ सीक्रेट सेवा” जारी थी।
बस फर्क इतना था कि यहां दवाई खुले में नहीं, “सम्मानपूर्वक” साड़ी, झोले और बाइक की डिक्की में रखकर दी जा रही थी।
क्योंकि बाहर संगठन वाले बैठे थे… और अंदर “सीक्रेट मेडिकल सेवा”।
कहा जा रहा था —दवाई धीरे से ले जाइए… नहीं तो हमें भी दिक्कत होगी और आपको भी पुलिस उठा ले जाएगी!

यानी अब इलाज से ज्यादा रोमांच दवाई खरीदने में है।ऐसा लग रहा है जैसे दवाई नहीं… मानो सीमा पार से माल सप्लाई हो रहा हो!”
देशभर में मेडिकल व्यवसायी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर थे।
ऑनलाइन दवाई बिक्री रोकने से लेकर कॉरपोरेट डिस्काउंट और भ्रामक दवा प्रचार के खिलाफ आवाज उठाई जा रही थी। मंचों से भाषण हो रहे थे… रैलियां निकल रही थीं… सफलता के दावे किए जा रहे थे।
लेकिन अमलीपदर के थाना रोड पर मानो किसी ने इस बंदी को “मजाक” समझ लिया।

यहां वर्षों से कथित रूप से संचालित एक अवैध मेडिकल स्टोर में हाथ-पैर दर्द से लेकर हाई पावर शेड्यूल-H और दूसरी गंभीर दवाइयां तक खुलेआम बेची जा रही थीं।
न लाइसेंस का डर…
न ड्रग इंस्पेक्टर का भय…
न स्टॉक रजिस्टर…
न बिल…
न फार्मासिस्ट…
बस मरीज आना चाहिए और दवाई निकलनी चाहिए।
और जब बाहर संगठन वालों की मौजूदगी बढ़ी तो इलाज का तरीका भी बदल गया।
“दवाई को साड़ी में छुपा लीजिए…”“झोले में रखिए…”धीरे से जाइए…” ऐसा माहौल बना दिया गया मानो कोई दवाई वितरण नहीं बल्कि फिल्मी तस्करी का दृश्य चल रहा हो।

— विभाग आखिर अनजान कैसे?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि थाना रोड जैसे व्यस्त इलाके में वर्षों से कथित रूप से दवाई का इतना बड़ा स्टॉक संचालित हो रहा था तो खाद्य एवं औषधि विभाग को इसकी भनक कैसे नहीं लगी?
क्या विभाग को सच में जानकारी नहीं थी? या फिर जानकारी थी लेकिन कार्रवाई की फाइल हमेशा “उचित समय” का इंतजार करती रही?
क्योंकि स्थानीय लोगों का दावा है कि यहां कार्टून भर-भरकर दवाइयां आती है, अलमारियों में सजती है और मरीजों को दी जाती है।
तो फिर सवाल उठता है—
दवाइयां सप्लाई कौन कर रहा है?
कौन से होलसेलर बिना बिल माल भेज रहे हैं?
क्या मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) भी इसमें शामिल हैं?
क्या ऐसे अवैध क्लीनिकों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण मिला हुआ है?
और सबसे बड़ा सवाल — जिले में ऐसे कितने “घर बैठे मेडिकल स्टोर” चल रहे हैं?
लाइसेंसी मेडिकल स्टोर बोले — हम नियम निभाएं और ये मजे करें?

एक वैध मेडिकल स्टोर खोलने के लिए लाइसेंस, फार्मासिस्ट, तापमान, रिकॉर्ड, स्टॉक रजिस्टर, शेड्यूल रजिस्टर, बिलिंग और निरीक्षण जैसी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
अगर एक स्ट्रिप दवाई का बैच नंबर गड़बड़ा जाए तो नोटिस, कार्रवाई और कोर्ट तक की नौबत आ जाती है।

लेकिन अवैध मेडिकल स्टोर में व्यवस्था बिल्कुल सरल है—
न रजिस्टर
न दस्तावेज
न जांच
न जवाबदेही
यही वजह है कि ऐसे क्लीनिक और अवैध मेडिकल स्टोर दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं।
यहां बिक रही दवाई असली है भी या नहीं?
विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध चैनलों में अक्सर ऐसी दवाइयां पहुंचती हैं जिनकी गुणवत्ता संदिग्ध होती है।
क्योंकि जहां कोई रिकॉर्ड ही नहीं, वहां गुणवत्ता जांच कौन करेगा?
क्या इन दवाइयों का लैब टेस्ट हुआ?
क्या एक्सपायरी और स्टोरेज मानकों का पालन होता है?
क्या मरीजों को असली दवाई मिल रही है या सिर्फ रंगीन पत्तियां?
और अगर भविष्य में किसी मरीज की तबीयत बिगड़ती है तो जिम्मेदार कौन होगा?
पुलिस पहुंची तो बंद हुई बिक्री_
बताया जा रहा है कि मरीजों को डराकर और छुपाकर दवाई देने की सूचना पुलिस तक पहुंची, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और कथित रूप से वहां दवाई वितरण बंद करवाया गया।

लेकिन बड़ा सवाल अब भी बाकी है—
क्या यह कार्रवाई सिर्फ उस दिन तक सीमित रहेगी?
या फिर विभाग अब पूरे नेटवर्क की जांच करेगा?
एक तरफ मेडिकल संगठन अपनी मांगों की सफलता का जश्न मना रहे है…
दूसरी तरफ थाना रोड पर अवैध मेडिकल स्टोर “बैकडोर सेवा” देकर पूरे आंदोलन की हवा निकाल रहा है।

यानी वैध दुकानों पर ताला …
और अवैध कारोबार पर तसल्ली।
अब देखना यह होगा कि विभाग इस खबर के बाद जागेगा…या फिर अगली बार दवाई और ज्यादा “सुरक्षित तरीके” से साड़ी, झोले और डिक्की मैं भरकर मरीजों के घर तक पहुंचाई जाएगी।

