थाना आ गया, बैंक अब भी रास्ता भटक गया! अमलीपदर में राष्ट्रीयकृत बैंक की मांग फिर हुई तेज
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
अमलीपदर में राष्ट्रीयकृत बैंक खोलने की मांग कोई नई नहीं है, लेकिन इस बार इस मांग ने फिर जोर पकड़ा है। छत्तीसगढ़ चेम्बर ऑफ कॉमर्स के प्रदेश मंत्री विनय कुमार पाण्डेय की पहल पर संगठन ने RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा को पत्र भेजकर अमलीपदर में राष्ट्रीयकृत बैंक शाखा खोलने की मांग की है। इस पहल से क्षेत्र के लोगों में एक बार फिर उम्मीद की किरण जगी है।

वर्षों से अमलीपदर के लोगों को बताया जाता रहा कि बैंक खोलने के लिए सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस थाना जैसी मूलभूत आवश्यकता जरूरी होती है। क्षेत्र के लोगों ने भी इस तर्क को सच मान लिया और इंतजार करते रहे। फिर समय बदला, अमलीपदर में थाना भी खुल गया, प्रशासनिक सुविधाएं भी बढ़ीं, तहसील मुख्यालय का दर्जा भी मिला, लेकिन राष्ट्रीयकृत बैंक आज भी मानो अमलीपदर का रास्ता पूछ रहा हो।
यही वह सवाल है जो अब लोगों की जुबान पर है। अगर बैंक खोलने के लिए थाना अनिवार्य था, तो थाना खुलने के बाद भी बैंक क्यों नहीं खुला? और यदि थाना ही सबसे बड़ा पैमाना था, तो फिर आसपास के ऐसे क्षेत्रों में कई बैंक शाखाएं कैसे संचालित हो रही हैं जहां स्थायी सुरक्षा व्यवस्था या पुलिस की निरंतर मौजूदगी नहीं है?

लोग व्यंग्य में कहने लगे हैं कि शायद बैंक खोलने के नियमों की कोई ऐसी किताब है जो सिर्फ अमलीपदर पर ही लागू होती है। बाकी जगहों पर नियम छुट्टी पर चले जाते हैं और अमलीपदर आते ही फिर ड्यूटी ज्वाइन कर लेते हैं।
अमलीपदर कोई छोटा बाजार नहीं है। यह तहसील मुख्यालय है, जहां लाखों किसानों और हजारों व्यापारियों का करोड़ों रुपये का लेन-देन होता है। किसानों को अपनी मेहनत की कमाई निकालने के लिए कई किलोमीटर दूर दूसरे कस्बों का रुख करना पड़ता है। कई बार पेट्रोल का खर्च निकालने के लिए भी उधार लेना पड़ता है और फिर अपने ही पैसे निकालने के लिए घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है।
व्यापारियों की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। रोजाना लाखों रुपये का कारोबार करने वाले लोगों को बैंकिंग सेवाओं के लिए दूसरे शहरों का सहारा लेना पड़ता है। नकदी लेकर लंबी दूरी तय करना जोखिम भरा भी है और समय की बर्बादी भी। लेकिन लगता है कि अमलीपदर की यह परेशानी अभी तक किसी बड़ी कुर्सी तक पहुंच नहीं पाई है।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि विकास की जंग केवल सड़क, बिजली और भवनों से नहीं जीती जाती। आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ माने जाने वाले बैंक भी विकास के सबसे बड़े हथियार होते हैं। जिस क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाएं मजबूत होती हैं, वहां व्यापार, रोजगार और निवेश के नए रास्ते खुलते हैं। लेकिन अमलीपदर आज भी इस जंग में बिना हथियार के मैदान में उतरा हुआ नजर आता है।
इसी कारण अब राष्ट्रीयकृत बैंक के साथ-साथ सहकारी बैंक की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। किसानों का मानना है कि यदि क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध हों तो उन्हें अपनी फसल का भुगतान पाने और कृषि संबंधी योजनाओं का लाभ लेने के लिए बार-बार भटकना नहीं पड़ेगा।
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे की चर्चा शुरू हो गई है। चुनाव के समय अमलीपदर की गलियां नेताओं की आवाजाही से गुलजार हो जाती हैं, लेकिन चुनावी शोर थमते ही बैंक की मांग फिर फाइलों के जंगल में खो जाती है। ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि क्या इस बार भी मांग केवल आश्वासनों की चौखट तक सीमित रहेगी या फिर कोई जनप्रतिनिधि इस जंग को अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाएगा?
फिलहाल चेम्बर ऑफ कॉमर्स द्वारा उठाई गई आवाज ने क्षेत्रवासियों के मन में नई उम्मीद जगाई है। अब देखना यह है कि यह आवाज सत्ता और व्यवस्था के बंद दरवाजों तक पहुंचकर परिणाम लाती है या फिर अमलीपदर को एक बार फिर इंतजार की लंबी कतार में खड़ा होना पड़ता है।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ एक बैंक का नहीं है, सवाल इस क्षेत्र की उपेक्षा का भी है जो तहसील मुख्यालय होने के बावजूद आज तक राष्ट्रीयकृत बैंक की छाया से वंचित है। और इस सवाल का जवाब आने वाला समय ही देगा कि यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया है, व्यवस्था की मजबूरी है या फिर अमलीपदर के हिस्से आई वह उपेक्षा, जिसके खिलाफ अब लोगों ने नई जंग छेड़ दी है।

