आवेदन के बदले ट्रैक्टर से निकाला समाधान!
क्या मैनपुर में जन्म ले रहे हैं नए दशरथ मांझी और “ब्रिज मैन” लोचन चक्रधारी?
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
बिहार के माउंटेन मैन दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी को समय पर इलाज न मिल पाने का कारण एक पहाड़ को माना था। वर्षों तक शासन-प्रशासन से उम्मीद लगाने के बजाय उन्होंने खुद हथौड़ा और छेनी उठाई और पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। इतिहास ने उन्हें “माउंटेन मैन” के नाम से याद रखा।
कुछ ऐसा ही नजारा आज मैनपुर क्षेत्र में भी देखने को मिल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पहाड़ की जगह सरकारी फाइलें और लंबा इंतजार रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन गए हैं।

“माउंटेन मैन” के बाद अब “ब्रिज मेन”लोचन चक्रधारी ! जहां सरकार नहीं पहुंची वहां 12 लाख खर्च कर बना दी पुलिया
मैनपुर के लोचन चक्रधारी ने वर्षों तक पुलिया निर्माण की मांग की। आवेदन दिए गए, मांग उठाई गई, आश्वासन मिले, लेकिन पुलिया नहीं बनी। आखिरकार उन्होंने फैसला किया कि इंतजार से बेहतर है समाधान। परिणाम यह हुआ कि करीब 12 लाख रुपये स्वयं खर्च कर, रिश्तेदारों से मदद लेकर और उधार जुटाकर उन्होंने पुलिया का निर्माण करवा दिया। जो काम वर्षों से सरकारी तंत्र नहीं कर पाया, वह एक व्यक्ति ने अपने संकल्प से पूरा कर दिखाया। ऐसे में लोग उन्हें “ब्रिज मैन लोचन चक्रधारी” कहने लगे हैं।

सरकार ने कहा “दिखेंगे” किसानों ने कहा “करेंगे”चंदा जुटा कर बना डाली सड़क ।खत्म क्या बरसों का इंतजार
अब ताजा मामला कोदो भाठा और अमलीपदर क्षेत्र के किसानों का है। वर्षों से खराब सड़क और कीचड़ भरे रास्ते किसानों की परेशानी बने हुए थे। बरसात में हालात इतने खराब हो जाते थे कि मवेशी तक फंस जाते थे और किसानों का खेतों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था।
कहते हैं कि समस्या समाधान शिविर में आवेदन भी दिए गए, पंचायत और प्रशासन के दरवाजे भी खटखटाए गए, लेकिन समाधान कहीं दिखाई नहीं दिया। फिर किसानों ने वही किया जो शायद अब इस क्षेत्र का नया विकास मॉडल बनता जा रहा है।
किसानों ने चंदा जुटाया, ट्रैक्टर लगाए, जेसीबी मशीन मंगाई और लगभग 3 किलोमीटर सड़क खुद बना डाली। यानी आवेदन का जवाब आखिरकार ट्रैक्टर और जेसीबी ने दे दिया।
आवेदन गया फाइलों में, किस पहुंच गए खेतों में ! ट्रैक्टर जेसीबी से खुद बना डाली 3 किलोमीटर सड़क ।
ग्रामीणों का कहना है कि कई अधिकारी आए, निरीक्षण किया, आश्वासन दिया और चले गए। लेकिन समस्या वहीं की वहीं रही। आखिरकार लोगों ने सोचा कि अगर फाइलों की रफ्तार से विकास होगा तो शायद अगली पीढ़ी सड़क देखेगी, इसलिए उन्होंने खुद ही समाधान निकाल लिया।
अब सवाल यह है कि क्या यह जनता की जागरूकता है या व्यवस्था की विफलता? क्या समस्या समाधान शिविरों में दिए गए आवेदन वास्तव में समाधान तक पहुंचते हैं या फिर फाइलों की तिजोरियों में सुरक्षित रख दिए जाते हैं?

दशरथ मांझी ने संदेश दिया था कि अगर सामने पहाड़ हो तो उसे काटकर रास्ता बनाया जा सकता है। मैनपुर के लोगों ने शायद उस संदेश को नए रूप में अपनाया है। यहां लोग अब पहाड़ नहीं, बल्कि इंतजार और उदासीनता को काटकर अपना रास्ता खुद बना रहे हैं।
अब देखना यह है कि सरकार ऐसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ देती है या फिर उन इलाकों तक विकास पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाती है, जहां जनता ने मजबूरी में खुद विकास का ठेका अपने हाथों में ले लिया है।

