जन्माष्टमी की रात महिला से कथित हैवानियत, नशे पर उठे सवाल
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
मंदिरों में कृष्ण के जयकारे…घरों में कान्हा के जन्म की खुशियां…और उसी जन्माष्टमी की रात गरियाबंद जिले के अंतर्गत अमलीपदर थाना के कोकड़ी माल गांव में एक महिला की चीखें!
कहानी ऐसी कि सवाल सिर्फ दो कथित आरोपियों पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर खड़ा हो गया है।

जिस कृष्ण को हम द्रौपदी की लाज बचाने वाला कृष्ण कहते हैं, उसी कृष्ण जन्माष्टमी की रात एक महिला अपनी जान और सम्मान बचाने के लिए अपनी घर की तरफ निर्वस्त्र होकर भागने को मजबूर हुई।
हे कृष्ण! इस बार मेरी भी इज्जत बचा लेते…
बताया जा रहा है कि शुक्रवार शाम करीब सात बजे महिला शौच होने के लिए घर से बाहर निकली थी। इसी दौरान दो युवक कथित तौर पर नशे की हालत में उसके साथ छीना-झपटी करने लगे ।
आरोप है कि महिला को सड़क से नीचे खींचकर ले जाया गया और उसके साथ बेहद अभद्र व्यवहार किया गया। पहनी हुई साड़ी और अन्य वस्त्र को जबरन उतार दी गई और खुद का भी कपड़ा निकाल कर ऐसा क्या करने वाले थे ?

महिला किसी तरह वहां से बच निकली और बदहवास हालत में अपने घर पहुंची। उसने अपनी सास को घटना बताई, जिसके बाद ग्रामीणों को जानकारी हुई।
कथित घटनास्थल पर महिला के कपड़े और एक युवक के कपड़े, चप्पल तथा टॉर्च मिलने की बात भी सामने आई है।
अब जरा सोचिए…अगर महिला जान बचाकर कई मीटर तक मुख्य सड़क से घर की तरफ भागी होगी, तो क्या उस रास्ते से वाहन नहीं गुजरे होंगे? क्या कोई राहगीर नहीं आया होगा? क्या किसी ने उसकी हालत नहीं देखी होगी?
और अगर देखा होगा… तो क्या किसी ने एक कपड़ा देकर यह नहीं सोचा होगा कि आज जन्माष्टमी के दिन मैं ही कृष्ण बन जाऊं?
क्योंकि कृष्ण बनने के लिए हमेशा चमत्कार जरूरी नहीं होता…
कभी-कभी किसी की इज्जत ढकने के लिए अपना एक कपड़ा देना ही काफी होता है।
लेकिन सवाल यह भी है—
क्या आज के दौर में कृष्ण बनना मुश्किल और कंस बनना आसान होता जा रहा है?
घटना की सूचना पुलिस को दी गई। पुलिस मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण किया। इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण अमलीपदर थाना पहुंचे।
खबर तैयार किए जाने तक पुलिस की पूछताछ और बयान दर्ज करने की कार्रवाई जारी थी। मामले की पूरी सच्चाई पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी।
इस घटना के बाद ग्रामीणों ने गांव में बढ़ते नशे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शाम होते ही आसपास के इलाकों से लोग शराब और अन्य नशे के सेवन के लिए पहुंचते हैं।
अगर नशा अपराध का कारण बन रहा है, तो सवाल है—नशे की बोतल आखिर कितने घरों की शांति और कितनी महिलाओं की सुरक्षा निगल रही है?
उस रात मंदिरों में कृष्ण की पूजा हो रही थी। शायद किसी मंदिर में कान्हा के सामने माखन का भोग लगा होगा…
कहीं आरती हो रही होगी…
कहीं द्रौपदी की लाज बचाने वाले कृष्ण की कथा सुनाई जा रही होगी…
और इसी बीच एक महिला अपनी जान बचाकर घर की ओर भाग रही थी।
कहानी में बस इतना फर्क है कि महाभारत में कृष्ण ने द्रौपदी की पुकार सुन ली थी… यहां महिला की पुकार सड़क, अंधेरे और समाज की चुप्पी के बीच दबती रही। क्या कृष्ण इस बार किसी मंदिर में इतने व्यस्त थे कि सड़क तक नहीं पहुंच पाए? या फिर उन्होंने महिला की जान तो बचा दी… लेकिन उसकी लाज बचाने की जिम्मेदारी हम इंसानों के हिस्से छोड़ दी? यह जवाब शायद भगवान से ज्यादा हमारे समाज को देना है।
कृष्ण ने कंस का अंत किया था। लेकिन आज का कंस सिर्फ एक व्यक्ति नहीं…नशा भी कंस है, अपराधी मानसिकता भी कंस है और अपराध देखकर चुप रहने वाली भीड़ भी कहीं न कहीं उस कंस को ताकत देती है।
द्रौपदी को कृष्ण मिल गए थे…आज की महिला को कृष्ण की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उसे चाहिए—सुरक्षित सड़क, जागता समाज, सख्त कानून और समय पर पहुंचती पुलिस। क्योंकि सवाल यह नहीं कि कृष्ण कहां थे?

सवाल यह है—
जब एक महिला मदद के लिए भाग रही थी, तब इंसान कहां थे?
जन्माष्टमी हर साल आएगी…कान्हा का जन्म हर साल मनाया जाएगा…लेकिन कोकड़ी माल की यह घटना हमसे एक सवाल छोड़ गई—
मंदिर में कृष्ण की पूजा करना आसान है…लेकिन सड़क पर किसी मजबूर महिला की मदद करके कृष्ण बनना इतना मुश्किल क्यों है?

