बड़ी खबर | बीजापुर वन मंडल में ‘बिगड़े वनों के सुधार’ योजना पर उठे गंभीर सवाल
वर्ष 2025 में बिना काम कराए करोड़ों रुपये निकालने का आरोप, ग्रामीणों के लिखित बयान से बढ़ी मामले की गंभीरता
घनश्याम यादव
बीजापुर बस्तर के माटी समाचार बीजापुर वन मंडल में बिगड़े वनों के सुधार के नाम पर संचालित योजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। आरोप है कि वर्ष 2025 में कई बीटों में निर्धारित कार्य कराए बिना ही करोड़ों रुपये की राशि निकाल ली गई। जिन जंगलों में सुधार कार्य होना था, वहां ग्रामीणों को काम होने के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले।
मामले को लेकर सबसे गंभीर आरोप यह है कि कुछ बीटों में बिल्कुल काम नहीं कराया गया, जबकि एक बीट में सीमित कार्य कराकर बाकी राशि के उपयोग को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों ने लिखित बयान देकर दावा किया है कि उनके गांव से लगे जंगलों में वन विभाग की ओर से संबंधित योजना के तहत कोई कार्य नहीं कराया गया।
मजदूरों के नाम पर तैयार हुए वाउचर?
योजना के तहत यदि कार्य कराए गए, तो उनका वास्तविक स्थल कौन-सा है? मजदूरों के नाम पर भुगतान दर्शाने वाले वाउचर किस आधार पर तैयार किए गए? कितने मजदूरों ने काम किया और कितनी राशि का भुगतान हुआ? इन सवालों के जवाब अब तक स्पष्ट नहीं हैं।
अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल
मामले में बीट गार्ड, डिप्टी रेंजर, रेंजर और एसडीओ की भूमिका को लेकर भी मिलीभगत के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो बीट गार्ड का कहना है कि डिप्टी रेंजर से बात करें और डिप्टी रेंजर से पूछा गया तो गोल मोल जवाब देते रहे।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के नाम पर खर्च का हिसाब कौन देगा?
बीजापुर के दूरस्थ और नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकारी योजनाओं के कार्यों का सत्यापन चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इसी परिस्थिति का फायदा उठाकर कागजों में कार्य दर्शाए गए? यदि ऐसा हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
जांच की मांग, इन बिंदुओं पर हो खुलासा
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए वर्ष 2025 के कार्यादेश, मस्टर रोल, मजदूरों की सूची, भुगतान वाउचर, माप पुस्तिका, कार्यस्थल की तस्वीरों और संबंधित बैंक भुगतान का मिलान किया जाना चाहिए। साथ ही, ग्रामीणों के लिखित बयानों के आधार पर संबंधित जंगलों का भौतिक सत्यापन भी कराया जाना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: यदि जंगलों में काम ही नहीं हुआ, तो करोड़ों रुपये के भुगतान का आधार क्या था? अब देखना होगा कि वन विभाग के उच्चाधिकारी मामले की जांच कराते हैं या नहीं और सरकारी धन के उपयोग को लेकर वास्तविक स्थिति कब सामने आती है।

