ट्राई साइकिल पर सवार सपनों का पिता: बेटी को आसमान तक पहुंचाने की ज़िद
भीख से जुटाता है दो वक्त की रोटी, पर सपने बुनता है डॉक्टर बिटिया के लिए
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS) गरियाबंद
फ़ादर्स डे… जब देशभर के बच्चे अपने पिता को महंगे तोहफों, केक और शानदार डिनर से खुश कर रहे हैं, ठीक उसी दिन गरियाबंद जिले के सराईपानी ग्राम पंचायत के केंदुपार्टी गांव में 8 साल की लवली नेताम ने अपने पिता को पड़ोस से मांगकर लाई गई थाली से भोजन करवाया — और इस तरह ‘फादर्स डे’ का असली अर्थ दुनिया को दिखा दिया।
लवली के पिता, तहसील नेताम, दिव्यांग हैं। उनका शरीर लकवाग्रस्त है, लेकिन मन उम्मीदों और संकल्पों से भरा हुआ। वे ट्राई साइकिल पर गांव-गांव जाकर भीख मांगते हैं। कोई उन्हें चावल देता है, कोई सिक्के और कोई पुराने फटे कपड़े। मगर जो भी मिलता है, उसमें से वह अपनी बेटी के लिए बेहतर भोजन और पढ़ाई की सामग्री जुटाते हैं। उनका सपना है— “मेरी लवली डॉक्टर बने और आसमान को छुए।”

जिंदगी ने छीना सबकुछ, पर नहीं टूटा हौसला
लवली जब मात्र 3 साल की थी, तब उसकी मां उन्हें छोड़कर चली गई— कारण था गरीबी और दिव्यांगता। उस दिन से तहसील नेताम ने उसे गोद में उठाकर पाला, सीने से लगाकर बड़ा किया। आज लवली स्कूल में अव्वल आ रही है, और अपने पिता की मेहनत की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है।
क्यों नहीं कोई लेता ऐसे बच्चों को गोद?
आज जब कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि गांवों को गोद ले रहे हैं, तो सवाल उठता है— लवली जैसे प्रतिभाशाली बच्चों को कोई क्यों नहीं गोद लेता? अगर कोई संस्था, समाजसेवी या विभाग उसकी शिक्षा की जिम्मेदारी उठाए, तो न सिर्फ लवली का भविष्य संवर सकता है, बल्कि तहसील नेताम का सपना भी हकीकत बन सकता है।
सिर्फ ट्राई साइकिल से नहीं चलता जीवन
तहसील नेताम को अब तक सिर्फ ₹500 की पेंशन और एक ट्राई साइकिल की सरकारी सहायता मिली है।
प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना जैसी मूलभूत सुविधाएं उन्हें आज तक नहीं मिल पाई हैं।
सिर्फ खाद्यान्न योजना के तहत मिलने वाला चावल ही उनका एकमात्र पक्का सहारा है।
जनसमस्या समाधान शिविर में मिली ट्राई साइकिल ने उनकी पहुंच जरूर बढ़ा दी है, लेकिन क्या सिर्फ ट्राई साइकिल देना ही “समाधान” है?
या फिर यह व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है, जो कह रही है—
“भीख मांगने की रफ्तार अब और तेज कर दो!”
हर दिन पिता का संघर्ष, हर दिन बेटी की मुस्कान
तहसील नेताम हार नहीं मानते। शाम को लौटने के बाद खुद खाना बनाते हैं, बेटी को पढ़ाते हैं, और फिर दोनों एक साथ सो जाते हैं— अगले दिन फिर उसी संघर्ष की नई सुबह के लिए।
फादर्स डे का असली चेहरा
जब देशभर में बच्चे गिफ्ट्स और पार्टी से फादर्स डे मना रहे हैं, लवली ने अपने पिता को दूसरों से मांगकर खाना खिलाया।
वह दृश्य आंखें नम कर देने वाला था— न कोई दिखावा, न कोई खर्चा— सिर्फ ममता, संघर्ष और सपनों की लौ।
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था,
“शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पिएगा वही दहाड़ेगा।”
तहसील नेताम शायद यही सोचकर रोज अपनी बेटी को पढ़ा रहे हैं— ताकि एक दिन वह पूरे आत्मविश्वास से दहाड़ सके।
अब सवाल हम सब से है…
इस फादर्स डे पर हमें सोचना होगा—
क्या हमारी सरकार और समाज ऐसे संघर्षशील पिता और होनहार बेटियों की ओर वाकई ध्यान दे रहे हैं?
या हम बस योजनाओं के प्रचार और आंकड़ों में ही उलझे रह गए हैं?

