बबली के सपनों को मिला सहारा: लकवाग्रस्त पिता की जिद और बेटी की लगन को वन विभाग ने दिया संबल
बस्तर की माटी न्यूज़,(BKM NATIONAL NEWS)केंदूपार्टी/गरियाबंद
फादर्स डे पर ‘बस्तर की माटी’ में प्रकाशित एक मार्मिक खबर ने न केवल दिल को छुआ, बल्कि व्यवस्था को भी झकझोर दिया। यह कहानी है केंदूपार्टी गांव के तहसील नेताम और उनकी होनहार बेटी बबली नेताम की, जो गरीबी और विषम परिस्थितियों में भी अपने सपनों को थामे हुए हैं।
बबली आगे पढ़ना चाहती है, उसका सपना है डॉक्टर बनना। लेकिन लकवाग्रस्त पिता के पास न तो आय का कोई स्रोत है और न ही बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाने की सामर्थ्य। बबली की मां उन्हें और उनके पिता को तब छोड़ गई जब तहसील नेताम लकवाग्रस्त हो गए और परिवार चलाने में असमर्थ हो गए। मात्र तीन साल की उम्र में मां का साथ छूट गया, और तब से बबली अपने पिता के साथ संघर्ष की राह पर चल रही है।
आज स्थिति यह है कि आठवीं कक्षा पूरी करने के बाद भी बबली नवमी में प्रवेश नहीं ले पा रही है, क्योंकि टीसी लेने के लिए भी पैसे नहीं हैं। सरकारी योजनाएं भले ही शिक्षा को निशुल्क बताती हों, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। आज भी जिसके पास पैसा नहीं है, उसके लिए अच्छी शिक्षा एक सपना ही रह जाती है।
इस खबर के प्रकाशन के बाद उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के इंदा गांव परिक्षेत्र के वन विभाग ने मानवीय पहल करते हुए बबली को ₹10,000 की आर्थिक सहायता प्रदान की। इसके साथ ही उसे स्कूल बैग, किताबें, कॉपी और अन्य आवश्यक सामग्री भी दी गई। वन विभाग ने यह भी भरोसा दिलाया कि वे बबली का नवमी कक्षा में दाखिला स्वयं करवाएंगे और भविष्य में भी उसकी पढ़ाई में सहायता करते रहेंगे। इस कार्य के लिए रेंजर श्री सुशील कुमार सागर और उनकी टीम प्रशंसा के पात्र हैं, जिनकी संवेदनशीलता ने बबली के चेहरे पर मुस्कान ला दी।
बबली के पिता तहसील नेताम, जो चलने-फिरने में असमर्थ हैं, बेटी को डॉक्टर बनते देखना चाहते हैं। जन समस्या समाधान शिविर में सरकार की ओर से उन्हें एक इलेक्ट्रॉनिक ट्राइसाइकिल दी गई है, जिसकी मदद से वे गांव-गांव जाकर भीख मांगने की परिक्षेत्र को और भी बढ़ा दिया हैं ताकि बेटी के अच्छी पढ़ाई और भोजन का खर्च जुटा सकें।
इस खबर के असर से न केवल वन विभाग, बल्कि जनपद पंचायत मैनपुर के सीईओ और उनकी टीम भी सक्रिय हो गए। उन्होंने बबली के परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिलाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। पंचायत सचिव को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि जल्द से जल्द आवास सूची में नाम जोड़कर आवास निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की जाए।
आज बबली सिर्फ एक बच्ची नहीं, बल्कि उम्मीद की वो किरण है जो यह दिखाती है कि अगर व्यवस्था संवेदनशील हो, समाज जागरूक हो और इच्छाशक्ति मजबूत हो—तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।
बबली की इस प्रेरणादायक कहानी ने अब कई सामाजिक संगठनों को भी प्रेरित किया है, जो उसकी सहायता के लिए आगे आने की तैयारी कर रहे हैं। बबली आज भी टकटकी लगाए दरवाज़े पर बैठी है, इस आस में कि कोई और मदद का हाथ बढ़ाएगा।
‘बस्तर की माटी’ इस मानवीय पहल और सहयोग भावना को सलाम करता है और उम्मीद करता है कि बबली जैसी बेटियां हर घर की प्रेरणा बनें।

