सेवानिवृत्त शिक्षक मजदूरी करने को मजबूर, सरकारी पेंशन का इंतजार

बस्तर के माटी समाचार सूरजपुर (ओडगी ) छत्तीसगढ़ । “25 से 30 साल तक बच्चों का भविष्य संवारने वाला शिक्षक आज अपना पेट पालने के लिए मजदूरी कर रहा है। यह कैसा लोकतंत्र है?” – यह सवाल उठ रहा है प्राथमिक विद्यालय खरहरी जोर के सेवानिवृत्त प्रधान पाठक श्री सुखलाल सिंह के मामले ने।
31 मार्च, 2024 को सहायक शिक्षक (LB) के पद से पदोन्नत होकर प्रधान पाठक के पद से सेवानिवृत्त हुए श्री सिंह आज भी अपनी पेंशन के लिए तरस रहे हैं। आर्थिक तंगी से जूझ रहे इस सेवानिवृत्त शिक्षक को अपना और अपने परिवार का गुजारा चलाने के लिए शारीरिक मजदूरी तक करनी पड़ रही है।
राष्ट्र निर्माता की यह दुर्दशा क्यों?
श्री सिंह का मामला कोई अकेला नहीं है। उनके साथ आवाज बुलंद कर रहे शिक्षक साथियों का कहना है कि 1998 से 2004 के बीच सेवानिवृत्त हुए हजारों शिक्षक इसी समस्या से जूझ रहे हैं। उन्होंने एक आवाहन जारी करते हुए कहा, “हर पांच साल में चुनाव ड्यूटी करने वाले, लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने वाले और ग्रामीण अंचल के विकास में सहभागी रहने वाले ये शिक्षक आज अपने हक के लिए तरस रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “जहां हर विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को पेंशन मिल रही है, वहीं शिक्षक, जिन्हें राष्ट्र का निर्माता कहा जाता है, मजदूरी करने पर मजबूर हैं। क्या यही है हमारे लोकतंत्र का चेहरा?”
“16,000 साथियों का भविष्य अधर में”
सेवानिवृत्त शिक्षकों के एक जत्थे ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर समय रहते सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो यह स्थिति लगभग 16,000 सेवानिवृत्त शिक्षक साथियों के सामने आ सकती है। उनका नारा है – “जागो मेरे साथियों जागो, अभी समय है। तब जागे तो क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।”
सरकार से मांग
असंगठित और लंबित पेंशन के मुद्दे पर सेवानिवृत्त शिक्षकों ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग का तत्काल ध्यान आकर्षित करने की मांग की है। उनकी मुख्य मांगें हैं:
1. 1998-2004 के बीच सेवानिवृत्त हुए सभी शिक्षकों की पेंशन को तुरंत मंजूरी दी जाए।
2. पेंशन प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और लालफीताशाही को तुरंत दूर किया जाए।
3. सेवानिवृत्त शिक्षकों के सम्मान और उनके आर्थिक हितों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
इस मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर दशकों तक देश का भविष्य गढ़ने वाले शिक्षकों के प्रति सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी क्या है? श्री सुखलाल सिंह का मामला सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि एक पूरे वर्ग की उपेक्षा की कहानी बन चुका है। अब नजर सरकार और प्रशासन पर है कि वह इस ‘चिड़िया’ को खेत चुगने से पहले जागती है या नहीं।

