डीजल दर्शन के लिए लगी महाकुंभ जैसी लाइन… खेती कम, टंकी का तीर्थ ज्यादा!
सड़कों के राजा रोड रोलर भी बोले — ‘पहले डीजल दो, फिर सड़क बनवाना!’
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
खेती के मौसम में जहां खेतों में ट्रैक्टर दौड़ने चाहिए थे, वहां आजकल पेट्रोल पंपों पर “ट्रैक्टर सम्मेलन” लगा हुआ है। हालत यह है कि किसान अब खेत में नहीं, बल्कि डीजल की लाइन में फसल उगाने की उम्मीद लगाए खड़े हैं।

अमलीपदर और आसपास के क्षेत्रों में पेट्रोल-डीजल की ऐसी किल्लत मची है कि लोग अब तेल भरवाने नहीं, बल्कि “दर्शन” करने पहुंच रहे हैं। पंपों पर लंबी कतारें ऐसी कि देखकर लगता है मानो सरकार ने मुफ्त डीजल वितरण योजना शुरू कर दी हो। फर्क बस इतना है कि यहां मुफ्त कुछ नहीं, बल्कि घंटों की तपस्या के बाद ₹200 का पेट्रोल और ₹2000 का डीजल प्रसाद स्वरूप मिल रहा है।
सबसे दिलचस्प नजारा तब देखने को मिला जब सड़क पर राज करने वाला रोड रोलर खुद लाइन में खड़ा नजर आया। जिस मशीन को देखकर लोग किनारे हो जाते थे, आज वही बेचारी टंकी खाली होने पर आम जनता के बीच कतार में खड़ी दिखाई दी।

लोगों ने कहा —
“आज रोड रोलर भी समझ गया कि असली ताकत डीजल में है, वजन में नहीं!”
खेती-किसानी के इस महत्वपूर्ण समय में ट्रैक्टरों की लाइन इतनी लंबी है कि कई लोगों ने मजाक में कहना शुरू कर दिया —
“अगर ऊपर से ड्रोन कैमरा चला दिया जाए तो लगेगा जैसे खेत नहीं, ट्रैक्टरों की बारात निकली हो।”
खाद्य विभाग की सख्ती ने जनता की परेशानी में और तड़का लगा दिया है। जर्किन, डिब्बा और बोतलों में पेट्रोल-डीजल देने पर रोक के बाद लोग मजबूरी में अपने वाहन घसीटते हुए पंप तक ला रहे हैं।

इधर किसानों का दर्द भी कम नहीं है। डीजल संकट का फायदा उठाकर कुछ ट्रैक्टर संचालकों ने किराया बढ़ा दिया है। खेत जुताई में प्रति घंटे ₹100 तक अतिरिक्त वसूले जा रहे हैं। यानी किसान अब फसल से पहले डीजल और किराए की महंगाई काट रहा है।
भीषण गर्मी में घंटों लाइन में खड़े लोग पसीने से तर-बतर नजर आए। कुछ बुजुर्ग तो यह कहते सुने गए —
“ऐसे ही हाल रहे तो अगली खेती बैलगाड़ी से करनी पड़ेगी… कम से कम बैल डीजल तो नहीं मांगता!”
पूरे मामले पर जब कलेक्टर भगवान सिंह ऊईके से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि अमलीपदर क्षेत्र के लिए दो टैंकर रवाना किए गए हैं और जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी।

लेकिन कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब एचपीसीएल के रीजनल मैनेजर से सवाल पूछा गया। पहले उन्होंने पूरे मामले को लगभग “असंभव” बता दिया। लेकिन जैसे ही पेट्रोल पंपों की खाली टंकियों और लंबी लाइनों की तस्वीरें भेजी गईं, जवाब बदल गया —
“डीलरों के पेमेंट के कारण भी ऐसा हो सकता है…”
और जब उन्हें पेट्रोल पंप संचालकों के बयान सुनाए गए, तो साहब का जवाब था —
“जहां छापना है छापो… जवाब आगे दूंगा।”
वाह साहब!
नीचे जनता लाइन में जल रही है… ऊपर अधिकारी जवाब में उबल रहे हैं और बौखलाएं भी !
किसान खेत छोड़कर डीजल खोज रहा है… और जिम्मेदार लोग बचने का बयान खोज रहे हैं।
अब सवाल यही है कि जब लाखों की गाड़ी लेकर आदमी ₹100 के डीजल के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहेगा, तो खेती करेगा कब?
अन्नदाता खेत जोतेगा या पेट्रोल पंप की परिक्रमा करेगा?
ऐसा लग रहा है मानो सिस्टम ने नया नारा जारी कर दिया हो —
“जय जवान, जय किसान… जय जर्किन और जय पेट्रोल पंप लाइन !”

