सागौन की तिजोरी नहीं मिली… तो साहब ने खटिया ही खोल दी! पलंग-पाट में छिपा था पूरा टिम्बर सीक्रेट
वन विभाग की दबिश में घर से बरामद हुए सागौन के 15 चिरान और 2 पलंग-पाट, अब लकड़ी बोलेगी—’मैं खटिया नहीं, सबूत हूं!’
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
कहते हैं कि चोरी की चीज़ ज़्यादा दिन तक छिपती नहीं… लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग निकली।
जनाब ने सोचा कि अगर सागौन की लकड़ी को जंगल में रखा तो पकड़े जाएंगे… इसलिए उसे सीधे खटिया बना दिया। शायद उम्मीद थी कि वन विभाग भी सोचेगा—”अरे! ये तो घरेलू फर्नीचर है।”
लेकिन साहब भूल गए कि जब सर्च वारंट लेकर वन विभाग घर पहुंचता है, तो खटिया भी सिर्फ आराम करने की चीज़ नहीं रहती… वो सबूत बन जाती है।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की टीम ने सूचना के आधार पर इंदा गांव निवासी मनोज कुमार साहू जो कि कोयबा ग्राम पंचायत में सचिव के पद पर पदस्थ हैं उनके के घर दबिश दी। तलाशी में सागौन के 15 नग चिरान और उन्हीं से बने 2 पलंग-पाट बरामद हुए। यानी लकड़ी ने जंगल से निकलकर सीधे बेडरूम तक का सफर तय कर लिया था।
लगता है सोच यही रही होगी कि… “जब अलमारी में नोट छिप सकते हैं, तो खटिया में सागौन क्यों नहीं?”

लेकिन वन विभाग ने इस बार आराम फरमा रही खटिया की नींद उड़ा दी। पलंग-पाट जब्त हुए और अब भारतीय वन अधिनियम 1927 व काष्ठ चिरान अधिनियम 1984 के तहत कार्रवाई शुरू हो गई है।

अब गांव में लोग भी मज़ाक में कह रहे हैं… “भाई, अब किसी के घर नई खटिया दिखे तो पहले पूछ लेना… लकड़ी बाजार से आई है या जंगल से!”

फिलहाल मामला जांच में है, लेकिन इतना तय है कि इस बार ‘आराम की खटिया’ सीधे ‘कानूनी कार्रवाई’ की चारपाई बन गई।

