घोर नक्सली इलाके में भरोसे की दस्तक !
सीआरपीएफ का सिविक एक्शन प्रोग्राम
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद,विशेष रिपोर्ट _ राजीव लोचन
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के नक्सल प्रभावित इलाकों में अब एक अलग ही तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है। जहां कभी सन्नाटा और संशय हावी रहता था, वहां अब संवाद और सहयोग की आवाज़ सुनाई दे रही है।
कहते हैं, जहां कभी सिर्फ “लाल सलाम” की गूंज थी, वहां अब “स्वास्थ्य जांच करवा लो” की पुकार सुनाई दे रही है — और यही बदलाव की असली कहानी है।

500 ग्रामीणों की मौजूदगी, 400 से ज्यादा का इलाज


इंदा गांव थाना क्षेत्र में Central Reserve Police Force की 211वीं बटालियन द्वारा आयोजित सिविक एक्शन प्रोग्राम में 500 से अधिक ग्रामीण शामिल हुए। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा निशुल्क स्वास्थ्य शिविर।
400 से ज्यादा ग्रामीणों की चिकित्सकीय जांच की गई।
डॉ. डी. तपस्विनी और उनकी टीम ने न केवल स्वास्थ्य परामर्श दिया, बल्कि जरूरी दवाइयों का मुफ्त वितरण भी किया। उनके कहने के मुताबिक सबसे ज्यादा एनीमिया के मरीज थे ।
ग्रामीणों के लिए यह किसी ‘सरकारी योजना के पोस्टर’ से ज्यादा, जमीन पर उतरती राहत जैसी रही। क्योंकि यहां अस्पताल का मतलब कई किलोमीटर की पैदल यात्रा हुआ करता था।

शिक्षा, स्वच्छता और खेल पर जोर
कार्यक्रम में सिर्फ इलाज ही नहीं, भविष्य भी बांटा गया।
स्कूल के बच्चों को पढ़ाई और मनोरंजन के लिए एलईडी टीवी दिया गया।
स्वच्छ पेयजल के लिए 8 सिंटेक्स पानी टंकियां सौंपी गईं।
बच्चों को स्कूल ड्रेस, बैग, कॉपी-किताब और स्टेशनरी वितरित की गई।
युवाओं को वॉलीबॉल, फुटबॉल और क्रिकेट किट दी गई।
महिलाओं को साड़ी, पुरुषों को लूंगी और गमछा, बुजुर्गों को कंबल और चप्पल दी गई।
यानी जहां कभी हथियारों की चर्चा होती थी, वहां अब क्रिकेट किट और पानी टंकी पर तालियां बज रही हैं।
बदलाव की यह पटकथा शायद किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती।

सीआरपीएफ 211 वीं बटालियन कमांडेंट विजय प्रताप का कहना है कि _ ऐसे कार्यक्रमों का क्षेत्र में सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है। जो लोग भटक गए हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सिर्फ ऑपरेशन नहीं, संवाद और विकास भी जरूरी है।
उनके मुताबिक, ग्रामीणों का भरोसा सुरक्षा बलों के प्रति लगातार मजबूत हो रहा है।
सुरक्षा बलों का मानना है कि इन पहलों से नक्सलियों को स्थानीय स्तर पर मिलने वाला समर्थन कम हुआ है —
और जब समर्थन घटता है, तो “क्रांति” का जोश भी थोड़ा ठंडा पड़ ही जाता है।

बदलती तस्वीर, बड़ा सवाल
गरियाबंद के नक्सल प्रभावित इलाकों में अब दो तस्वीरें साथ-साथ चल रही हैं—
एक तरफ सुरक्षा अभियान की सख्ती,
दूसरी तरफ विकास और विश्वास की पहल।
सवाल यह है कि क्या ये सिविक एक्शन कार्यक्रम लंबे समय तक शांति और स्थायित्व की नई इबारत लिख पाएंगे?
या फिर ये प्रयास भी किसी सरकारी फाइल की तरह “कार्य प्रगति पर है” में अटक जाएंगे?
फिलहाल, इंदा गांव से आई ये तस्वीरें उम्मीद जरूर जगा रही हैं।
और उम्मीद, किसी भी संघर्ष क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव होती है।

