डूमर बहाल में संवेदनशील पहल_दिव्यांगों की पुकार पर त्वरित कार्रवाई, अब ‘सिर्फ वादे नहीं—कुछ काम भी’
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
“गांव चलो – बस्ती चलो” अभियान को लेकर अक्सर यह तंज सुनने को मिलता है कि नेता गांव तक तो पहुंचते हैं, लेकिन समस्याएं वहीं की वहीं रह जाती हैं। पर डूमर बहाल की यह कहानी थोड़ी अलग है—यहां इस बार सिर्फ भाषण नहीं, कुछ समाधान भी देखने को मिला।

11 अप्रैल 2026 को ग्राम पंचायत डूमर बहाल में आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम में दिव्यांग हितग्राही संजु सोनवानी ने अपनी पीड़ा कुछ इस तरह रखी कि सुनने वालों को भी असहज होना पड़ा। कच्चे जर्जर मकान में जिंदगी, ऊपर से टूटी छत, और सहारे के नाम पर सिर्फ बैसाखी—बारिश आते ही घर छोड़कर पड़ोस में शरण लेना उनकी मजबूरी बन चुकी थी।
कहते हैं, “नेताओं की चाहत हो तो पहाड़ भी हिल जाए… और न हो तो चने भी नहीं गलते।”
यहां शायद चाहत जाग गई थी।
जनसंवाद के दौरान कार्यकर्ताओं ने सिर्फ “देखेंगे-करेंगे” का राग नहीं अलापा, बल्कि मौके पर घर पहुंचकर हालात देखे। टूटी दीवारें और टपकती छत ने कागजी योजनाओं की पोल खोल दी—और शायद यही वह पल था जब फाइलों को भी दौड़ना पड़ा।

महज दो दिन में, 13 अप्रैल को, समाज कल्याण विभाग ने बारीक पारा में शिविर लगाकर ट्राय सायकल, व्हीलचेयर और बैसाखी का वितरण किया। मुख्य अतिथि चवन लाल बघेल ने अपने हाथों से उपकरण सौंपे।
आम तौर पर ऐसे कार्यक्रमों में फोटो ज्यादा और राहत कम दिखती है, लेकिन इस बार तस्वीरों के साथ-साथ जरूरत भी पूरी होती नजर आई।
अब बात सिर्फ उपकरण तक सीमित नहीं रही। “मोर आवास मोर अधिकार” के तहत संजु सोनवानी और विधवा भोजमनी यदु की आवास समस्या भी सामने आई। वर्षों से आवेदन करने के बावजूद पक्का मकान न मिलना—यह कहानी नई नहीं है, लेकिन इस बार उस पर ध्यान गया।
चवन लाल बघेल ने आश्वासन दिया कि दोनों को जल्द ही प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिलेगा।
हालांकि गांव के लोग यह भी कहते दिखे—
“आश्वासन तो कई बार मिले हैं… फर्क बस इतना है कि इस बार उम्मीद थोड़ी ज्यादा लग रही है।”

कार्यक्रम में सरपंच दुखलेश्वर धुर्वा, भाजपा कार्यकर्ता और ग्रामीण बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
यह पहल एक उदाहरण जरूर बनी है, लेकिन साथ ही एक सवाल भी छोड़ गई है—
अगर हर बार ऐसी ही ‘चाहत’ दिखे, तो शायद गांव-गांव की तस्वीर बदल सकती है।
क्योंकि सच्चाई यही है—
“जब चाहत फाइलों में अटकती है, तो योजनाएं भी लाचार हो जाती हैं…
और जब चाहत जमीन पर उतरती है, तो बैसाखी भी सम्मान में बदल जाती है।”
डूमर बहाल की यह कहानी बताती है कि “गांव चलो – बस्ती चलो” सिर्फ नारा नहीं, अगर सही मायनों में लागू हो—तो यह दर्द से राहत तक का सफर भी बन सकता है।

