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मोमोस के दौर में मड़िया का मोर्चा_ अमलीपदर में देसी स्वाद ने फास्ट फूड को दी खुली चुनौती!

जब युवा ढूंढ रहे हैं ‘पिज़्ज़ा और एनर्जी ड्रिंक्स’, सेवन सिंह पुजारी परोस रहे हैं ‘सेहत बूस्ट’ मड़िया पेज!

बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद

आज का दौर बड़ा विचित्र है। गांव का बच्चा अब दादी के हाथ की घुघरी से ज्यादा मोमोस की चटनी पहचानता है। कभी मड़िया, कोदो, कुटकी और दलहन-तिलहन गांव की रसोई की शान हुआ करते थे, लेकिन अब फास्ट फूड के चमकदार बोर्डों ने देसी व्यंजनों को मानो कोने में खड़ा कर दिया है। ऐसे समय में अमलीपदर के पूर्व सरपंच एवं कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव सेवन सिंह पुजारी ने एक ऐसा काम शुरू किया है, जो सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि परंपरा, सेहत और खेती को बचाने की मुहिम बनता जा रहा है।

अमलीपदर के साप्ताहिक बाजार में इन दिनों कोई पिज्जा कॉर्नर नहीं, बल्कि देसी स्वाद का चौपाल सज रहा है। यहां हर सप्ताह लोगों को नि:शुल्क मड़िया पेज और चना घुघरी परोसी जा रही है। जानकारी के अनुसार, प्रति सप्ताह लगभग 8 किलो चने की घुघरी और 6 से 7 मटके मड़िया पेज का वितरण किया जा रहा है।
सेवन सिंह पुजारी बताते हैं कि उनके पिता घर आने वाले मेहमानों को मड़िया पेज पिलाकर आत्मीयता निभाते थे। समय बदला, लोग घरों से बाजारों तक सिमट गए, तो उन्होंने परंपरा को भी बाजार चौक तक पहुंचा दिया।

फास्ट फूड का फैशन या बीमारियों का निमंत्रण?
कभी जिन बीमारियों का नाम केवल बड़े-बुजुर्गों में सुनाई देता था, आज वही कम उम्र में बच्चों और किशोर-किशोरियों तक पहुंच रही हैं। शुगर, ब्लड प्रेशर, मोटापा जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी संतुलित और पारंपरिक आहार को अपनाने की सलाह देते हैं। किशोरों को अत्यधिक फास्ट फूड से दूरी बनाने की बात अक्सर कही जाती है।
व्यंग्य यह है कि जिस मड़िया को कभी गरीब का भोजन समझा गया, आज वही दुनिया के कई हिस्सों में “सुपरफूड” कहलाने लगा है। और हम हैं कि हजारों साल पुराने पोषण को छोड़कर तेल, मसालों और रसायनों से भरे चमकदार पैकेटों के पीछे भाग रहे हैं।

मड़िया सिर्फ भोजन नहीं, किसानों की मुस्कान भी है
मड़िया पेज और चना घुघरी का महत्व सिर्फ थाली तक सीमित नहीं है। यदि लोग ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों को अपनाते हैं, तो क्षेत्रीय किसानों को भी सीधा लाभ मिलेगा। मड़िया, कोदो, कुटकी, दलहन और तिलहन जैसी पारंपरिक फसलों की मांग बढ़ेगी, जिससे स्थानीय कृषि को नया जीवन मिलेगा।

 

इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी खाद्य संस्कृति से जुड़ सकेंगी। गांव की रसोई फिर से खेतों से जुड़ेंगी और खेत फिर से बाजार में सम्मान पाएंगे।
देसी थाली बनाम विदेशी चटनी ।

आज का युवा जहां “एक प्लेट मोमोस विथ एक्स्ट्रा एनर्जी लिक्विड ” की तलाश में है, वहीं अमलीपदर में कुछ लोग अब भी मानते हैं कि असली स्वाद और शक्ति मिट्टी की खुशबू में है। मड़िया पेज शरीर को ठंडक देता है, ऊर्जा प्रदान करता है और स्थानीय खाद्य परंपरा को जीवित रखता है।
सेवन सिंह पुजारी का यह प्रयास केवल मड़िया पेज और चना घुघरी बांटना नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है—फास्ट फूड के फैशन से बाहर निकलो, देसी भोजन को अपनाओ और स्वस्थ समाज की नींव मजबूत बनाओ।”
स्थानीय लोगों और व्यापारियों द्वारा इस पहल की सराहना की जा रही है। उनका मानना है कि ऐसे प्रयास नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हैं और समाज को स्वस्थ दिशा देते हैं।
क्योंकि आखिरकार सवाल सिर्फ पेट भरने का नहीं है—
यह तय करने का है कि आने वाली पीढ़ियों को हम अस्पतालों की कतार देंगे या दादी की थाली।

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