तीन दिन पहले खिसका जंगल, विभाग को आज तक खबर नहीं!
8–10 एकड़ पहाड़ दरका, हाथी से बड़े पत्थर ढलान पर अटके… सवाल यह कि वन विभाग आखिर देख क्या रहा है?
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद

गरियाबंद जिले के देवभोग वन परिक्षेत्र के इंदागांव क्षेत्र स्थित कक्ष क्रमांक 1293 में लगातार बारिश के बीच जंगल का बड़ा हिस्सा खिसकने की घटना सामने आई है। प्रारंभिक तौर पर करीब 8 से 10 एकड़ क्षेत्र में भूस्खलन जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं। बड़े-बड़े पत्थर पहाड़ी से नीचे तक आ चुके हैं और कई चट्टानें अभी भी ढलान पर अस्थिर नजर आ रही हैं।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल भूस्खलन से भी बड़ा है—
घटना को तीन दिन बीत गए, लेकिन वन विभाग को इसकी भनक तक कैसे नहीं लगी?

और उससे भी बड़ा सवाल—
जिस जंगल की निगरानी की जिम्मेदारी वन विभाग की है, वहां इतनी बड़ी घटना के बाद भी मौके पर विभाग का एक कर्मचारी तक क्यों नजर नहीं आया?
पत्थर खिसका या विभाग की निगरानी व्यवस्था?

जब बस्तर की माटी न्यूज़ की टीम घटनास्थल तक पहुंची तो रास्ता किसी आसान सफर का हिस्सा नहीं था। करीब 3 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा। हालात ऐसे कि टीम के सदस्यों को कई जगह जूते-चप्पल तक उतारकर आगे बढ़ना पड़ा।
मुश्किल रास्तों को पार करते हुए जब टीम घटनास्थल तक पहुंची तो वहां का नजारा देखकर स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता था।
मौके पर हाथी के आकार से भी बड़े-बड़े पत्थर ढलान पर दिखाई दिए। कुछ पत्थर ऐसे स्थान पर थे, जिन्हें देखकर साफ तौर पर आशंका बनती है कि लगातार बारिश और पानी के बहाव की स्थिति में ये दोबारा नीचे की ओर खिसक सकते हैं।
अब सवाल यह है कि—
अगर पत्रकार तीन किलोमीटर पैदल चलकर, जान जोखिम में डालकर जंगल के भीतर पहुंच सकता है, तो वन विभाग की गश्ती टीम वहां तक क्यों नहीं पहुंच सकी?
आज जंगल खिसका है, कल कोई जिंदगी न खिसक जाए!

घटनास्थल पर जमीन में दरारें और खिसके हुए पत्थर आने वाले खतरे का संकेत दे रहे हैं। अगर बारिश का दौर जारी रहता है और पानी का बहाव बढ़ता है, तो ढलान पर मौजूद अस्थिर चट्टानें नीचे की ओर आ सकती हैं।
ऐसे में अगर कोई बड़ा पत्थर निचले हिस्से तक पहुंच गया तो नुकसान सिर्फ जंगल का नहीं होगा।

फिर सवाल होगा—जिम्मेदार कौन?
प्रशासन कहेगा जांच होगी, विभाग कहेगा निरीक्षण किया जाएगा और फाइल शायद किसी टेबल पर जाकर टिक जाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि—
जनहानि होने से पहले निरीक्षण होगा या जनहानि के बाद पंचनामा बनेगा?
जंगल में पेड़ कम हुए या संरक्षण की जिम्मेदारी?
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र में लंबे समय से जंगल की जमीन पर अवैध कब्जे और पेड़ों की कटाई की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई हिस्सों में जंगल साफ कर मक्का की खेती किए जाने की बात भी कही जा रही है।
यदि वर्षों से जंगल की जमीन पर पेड़ काटकर खेती का सिलसिला चल रहा है, तो सवाल वन विभाग की निगरानी पर भी उठना स्वाभाविक है।
क्योंकि जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं है।
पेड़ पहाड़ की मिट्टी को पकड़कर रखते हैं।
जब पेड़ कटेंगे, जमीन कमजोर होगी और बारिश अपना रास्ता बनाएगी, तो फिर मिट्टी और चट्टानों के खिसकने का खतरा भी बढ़ेगा।
लेकिन यहां सवाल यह है कि—
क्या विभाग को पेड़ कटने की आवाज नहीं सुनाई देती?
क्या मक्का की फसल जंगल विभाग की नजर से भी ऊंची हो गई है?
क्या अतिक्रमण की शिकायतें सिर्फ कागज पर घूमती रहती हैं?
कभी बाघ का इलाका था, अब लकड़बग्घा दिख जाए तो खुशी!
स्थानीय पर्यावरण को लेकर एक और चिंता सामने आती है।
बताया जाता है कि कभी इस क्षेत्र में बाघ जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी हुआ करती थी। आज स्थिति ऐसी बताई जा रही है कि उसी इलाके में लकड़बग्घा दिखाई दे जाए तो उसे भी बड़ी बात माना जाता है।
सवाल सिर्फ एक वन्यजीव के गायब होने का नहीं है।
सवाल यह है कि—
जब जंगल का प्राकृतिक आवास ही धीरे-धीरे कमजोर होगा, पेड़ कटेंगे, जमीन पर कब्जे होंगे और खेती बढ़ेगी, तो वन्यजीव जाएंगे कहां?
पत्रकार पहुंच गया, विभाग कब पहुंचेगा?
सबसे गंभीर बात यह है कि भूस्खलन की घटना के तीन दिन बाद भी मौके पर वन विभाग की मौजूदगी दिखाई नहीं दी।
बस्तर की माटी न्यूज़ की टीम ने तमाम मुश्किलों के बावजूद घटनास्थल तक पहुंचकर स्थिति को कैमरे में कैद किया और प्रशासन तक मामला पहुंचाने की कोशिश की।
लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है—
क्या जंगल की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी अब मीडिया को निभानी पड़ेगी?
अगर पत्रकारों को खबर की तलाश में तीन किलोमीटर पैदल चलकर जंगल के भीतर जाना पड़ रहा है और विभाग को अपने ही जंगल में हुई 8–10 एकड़ क्षेत्र की बड़ी घटना का पता तीन दिन तक नहीं चलता, तो फिर वन सुरक्षा की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।
अब विभाग से सिर्फ निरीक्षण नहीं, जवाब चाहिए
वन विभाग को तत्काल घटनास्थल का निरीक्षण कर—
भूस्खलन की वास्तविक वजह की जांच करनी चाहिए।
अस्थिर चट्टानों और ढलान वाले हिस्सों का सर्वे कराया जाना चाहिए।
निचले हिस्से में रहने वाले लोगों की सुरक्षा का आकलन किया जाना चाहिए।
जंगल में अवैध कटाई और अतिक्रमण की जांच होनी चाहिए।
मक्का की खेती के लिए वनभूमि के उपयोग की वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए।
पिछले वर्षों में मिली शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का भी रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ आज खिसकी 8–10 एकड़ जमीन का नहीं है।
सवाल उस पूरे जंगल का है, जो अगर इसी तरह धीरे-धीरे खिसकता रहा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए शायद सिर्फ नक्शे में जंगल रह जाएगा।
आज पहाड़ खिसका है… कल पत्थर खिसक सकता है… और अगर व्यवस्था फिर भी नहीं जागी तो सवाल यह होगा कि अगली बार नुकसान होने के बाद जागने की कीमत कौन चुकाएगा?
बस्तर की माटी न्यूज़ का सवाल सीधा है—
जंगल की रखवाली कौन कर रहा है और वन विभाग आखिर मौके पर कब पहुंचेगा?

