गुरुजी का सुई नहीं, अब चलेगा सिर्फ कलम – झोलाछाप डॉक्टरों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई, रफूचक्कर हुए कई नामचीन “बड़े डॉक्टर”
बस्तर के माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरयाबंद
जिले में झोलाछाप और कथित बंगाली डॉक्टरों की बढ़ती संख्या और उनके गैरकानूनी इलाज पर आखिरकार स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटी। हाल ही में पेंड्रा गांव में कथित बंगाली डॉक्टरों के इलाज से ग्रामीण पुरुषोत्तम ध्रुव की मौत के बाद प्रशासन हरकत में आया। इसी मामले में बुधवार को उन दोनों फरार झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई और उनकी तलाश तेज हो गई।

इसी कड़ी में बुधवार को जिला स्तरीय स्वास्थ्य अमला की टीम ने अमली पदर क्षेत्र के विभिन्न क्लीनिकों में औचक निरीक्षण किया और ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टरों का पता भी लगाया। टीम का नेतृत्व डॉ. हरीश चौहान कर रहे थे, जिनके साथ करीब 8 सदस्यीय दल मौजूद था।
सबसे पहले जांच टीम मैनपुर ब्लॉक स्थित स्वर्णाबहाल के एक हाईस्कूल शिक्षक के क्लिनिक पहुंची। यही वही शिक्षक हैं जिनके क्लिनिक पर कुछ दिन पहले मीडिया में सवाल उठे थे। जब टीम मौके पर पहुंची तो क्लिनिक बंद मिला। बाद में शिक्षक को बुलाकर शटर खुलवाया गया। तलाशी में सिर्फ बीपी मशीन, स्टेथोस्कोप और कुछ सामान्य दवाइयाँ मिलीं। हालांकि, टीम ने शिक्षक के पूरी गतिविधि को संदेहास्पद मानते हुए नोटिस जारी किया और सभी दस्तावेज जमा करने के निर्देश दिए।
सूत्रों के अनुसार, उक्त शिक्षक ने कुछ दिन पहले ही कई सारे दवाइयाँ पड़ोस के एक घर में छिपा दीं और खून-पेशाब की जांच संबंधी उपकरण अपने स्कूल की लैबोरेटरी रूम में शिफ्ट कर दिए थे।
इसके बाद जांच दल ने भाटी पारा के पॉलीक्लिनिक का निरीक्षण किया, जहां कागजात संतोषजनक पाए गए। टीम आगे अमलीपदर के अंजना बंगाली क्लिनिक और उससे जुड़े पैथोलॉजी सेंटर पहुंची तो वहां ताला लटका मिला। यही नहीं, आसपास के कई अन्य क्लिनिक भी अचानक बंद हो गए। यहां तक कि कथित “बड़े डॉक्टर” भी दरवाजे बंद कर फरार हो गए।
जांच टीम खडारी पारा के एक वेटनरी मित्र के पास भी पहुँची, जो पशुओं के बजाय मानव रोगियों का इलाज करता था। लेकिन उसका क्लिनिक भी बंद मिला।

लोगों के मन में खड़े हो रहे कुछ सवाल_
सबसे अहम सवाल यही है कि जांच टीम के पहुँचने से पहले ही हर बार के तरह इस बार भी झोलाछाप डॉक्टरों को खबर कैसे मिल गई?
गांव-गांव में चना-मुर्रा के तरह मिलने वाले सभी एलोपैथी के दवाइयाँ को उपलब्ध करवाने वाले झोलाछाप डॉक्टरों के पास प्रतिबंधित दवाइयाँ और हाइ पावर एंटीबायोटिक दबाईयां कहाँ से आती हैं?
बाइक पर घूम-घूम कर इलाज करने वालों का हौसला इतना बुलंद क्यों है?
आखिर इनको संरक्षण देने वाले लोग कौन हैं?
अचानक क्लिनिक बंद कर भाग जाना प्रशासन की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े करता है। अगर सूचना लीक हुई तो इसके पीछे जिम्मेदार कौन है? यह सवाल अब ग्रामीणों के मन में गहराई से उठ रहे हैं।
झोलाछाप डॉक्टरों का गहरा नेटवर्क फिर भी मचा हड़कंप
गरियाबंद जिले में झोलाछाप डॉक्टरों का नेटवर्क बेहद मजबूत है। एक सर्वे के मुताबिक, जिले में इनकी संख्या हजार से ज्यादा है। इनमें से कई तो चौथी-पाँचवीं तक पढ़े होते हैं, लेकिन खुद को डॉक्टर बताकर भोले-भाले ग्रामीणों का इलाज करते हैं। न मेडिकल डिग्री, न दवाओं का ज्ञान—नतीजा यह कि छोटी बीमारी भी जानलेवा बन जाती है। स्वास्थ्य विभाग की इस कार्रवाई को देखते हए कई झोलाछाप डॉक्टरों के बीच हड़कंप मच गया । सभी झोलाछाप डॉक्टर इधर-उधर भागते नजर आए तो कई अपने-अपने झोला को छुपाते नजर आए । जब तक टीम क्षेत्र में रहे कोई भी झोला छाप डॉक्टर मरीज के इलाज करते नहीं दखे ।

झोलाछाप डॉक्टरौ का गैर जिम्मेदाराना इलाज का उदाहरण पुरुषोत्तम का दर्द भरा मौत है। पाइल्स के साधारण इलाज के नाम पर बंगाली डॉक्टरों की लापरवाही ने उसकी जिंदगी छीन ली। ग्रामीणों का कहना है कि इससे पहले भी ऐसे “डॉक्टरों” के कारण कई लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ चुके हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या स्वास्थ्य विभाग केवल जांच और नोटिस तक सीमित रहेगा या फिर ठोस कार्रवाई भी होगी? ग्रामीणों का कहना है कि आज की कार्रवाई से झोलाछाप डॉक्टरों, खासकर बंगाली डॉक्टरों में भय की स्थिति जरूर बनी है। लेकिन यह डर कब तक रहेगा? क्योंकि अक्सर होता यह है कि टीम के जाने के बाद वही क्लिनिक कुछ दिनों में फिर से चालू हो जाते हैं।
आज समय की सबसे बड़ी जरूरत है कि इस अवैध कारोबार पर नकेल कसी जाए। औचक निरीक्षण ही नहीं, बल्कि नियमित निगरानी और कानूनी कार्रवाई जरूरी है। जब तक गिरफ्तारी और सख्त दंड नहीं होंगे, यह समस्या खत्म नहीं होगी।
ग्रामीणों की जिंदगी किसी प्रयोगशाला की तरह नहीं हो सकती। पुरुषोत्तम जैसे मामलों से सबक लेकर प्रशासन को कठोर कदम उठाने होंगे। वरना सवाल उठते रहेंगे
क्या झोलाछाप डॉक्टरों की पकड़ इतनी मजबूत है कि प्रशासन भी उनके आगे बेबस है?
कब तक स्वर्णाबहाल के सुई लगाने वाले शिक्षक जैसे लोगों के चुंगल में फसते रहेंगे?और मासूम लोग इलाज के नाम पर मौत के मुंह में जाते रहेंगे?

