कृष्णा कुंजाम
जगदलपुर बस्तर के माटी समाचार जनपद पंचायत दरभा के जनपद सदस्य राजू सोढ़ी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि बस्तर की पहचान उसकी आदिवासी संस्कृति, परंपरा और आस्था से है। यहां का सबसे बड़ा पर्व बस्तर दशहरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की आत्मा और गौरव का प्रतीक है। लेकिन आज स्थिति यह है कि जिस पर्व को आदिवासी समाज अपने श्रम और आस्था से जीवित रखता है, उसी में उन्हें सबसे अधिक अपमान और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि दशहरा में रथ खींचने वालों और देवी-देवताओं के रक्षकों को कृषि मंडी जैसे असुविधाजनक स्थानों पर ठहराया जा रहा है। बरसात के दिनों में लोग पानी में भीगते हैं और मालवाहक ट्रकों से इधर-उधर लाए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर नेताओं के लिए करोड़ों रुपये के आलीशान पंडाल बनाए जाते हैं और बाहर से आए मेहमानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के होटल उपलब्ध कराए जाते हैं।
सोढ़ी ने सवाल उठाया कि जब हर साल बस्तर दशहरा के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये सरकार, सीएसआर और डीएमएफ फंड से खर्च किए जाते हैं, तो फिर यह धनराशि कहाँ जा रही है? क्या यह केवल लालबाग की सजावट और नेताओं की सुख-सुविधा पर खर्च करने के लिए है? खनिज संपदा वर्षों से बस्तर से बाहर ले जाई जा रही है, लेकिन उसी बस्तर के मूल आदिवासी समाज के लिए सम्मानजनक व्यवस्था तक उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने कहा कि जिन देवी-देवताओं की आस्था पर दशहरा आधारित है, उनके लिए भी सुरक्षित और गरिमामय स्थान उपलब्ध नहीं है। कृषि मंडी में पानी गिर रहा है, लोग कहां सोएंगे इसकी कोई व्यवस्था नहीं है, और प्रशासन इस पर ध्यान नहीं दे रहा।
सोढ़ी ने चेतावनी दी कि बस्तर दशहरा की आत्मा आदिवासी समाज में ही बसती है। यदि यही समाज उपेक्षित और अपमानित रहेगा तो पर्व की आत्मा कमजोर होगी। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि नेताओं की सुख-सुविधा पर खर्च करने की बजाय आदिवासियों के सम्मान, उनकी परंपरा और उनके देव-देवताओं की उचित देखरेख में धन लगाए। यही असली बस्तर का विकास होगा।

