RNI NO. CHHHIN /2021 /85302
RNI NO. CHHHIN /2021 /85302
best news portal development company in india
best news portal development company in india

 

एक पेड़ माँ के नाम’ बनाम ‘जंगल काट बेटे के नाम’ — वन विभाग की नाक के नीचे अवैध गांव, मक्का की खेती और कमीशन का खेल 
कोतरा डंगरी बना अवैध कॉलोनी ।

बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS)गरियाबंद 

देश में आजकल ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे अभियान ज़ोरों पर हैं। मंचों से पर्यावरण बचाने की शपथ ली जा रही है, विज्ञापनों में हरियाली का सपना दिखाया जा रहा है। लेकिन छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के अमलीपदर क्षेत्र से जो सच्चाई सामने आ रही है, वह इन तमाम दावों पर करारा तमाचा है।

हम बात कर रहे हैं कोतरा डंगरी और खरी पथरा जंगल की—जो संरक्षित वन मंडल के अंतर्गत आता है। यह कोई छोटा-मोटा जंगल नहीं था, बल्कि सैकड़ों हेक्टेयर में फैला घना वन क्षेत्र, जहां कभी वन्यजीवों की चहल-पहल और पक्षियों की आवाज़ें गूंजती थीं। आज उसी जंगल का करीब 800 से 1000 एकड़ हिस्सा पूरी तरह साफ कर दिया गया है।

यहां कीमती पेड़ों की अवैध कटाई, जंगल की ज़मीन पर मक्का, उड़द और अन्य फसलों की खेती, और अब अवैध गांवों की बसाहट साफ दिखाई दे रही है। हैरत की बात यह है कि वन विभाग का आधिकारिक दावा है— “हमें इसकी कोई जानकारी नहीं। पता करवाते है।”
लेकिन ज़मीनी हकीकत और अंदरूनी सूत्र कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, उड़ीसा के नवरंगपुर, और छत्तीसगढ़ के बस्तर,जगदलपुर क्षेत्र से आए लोगों को सुनियोजित तरीके से जंगल की ज़मीन पर बसाया गया। आरोप यह भी है कि इस अवैध बसाहट के पीछे पैसे का खेल है, जिसमें बसाहट करवाने वाले वहां के कुछ लोग और वन विभाग के कुछ कर्मियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
कहा जा रहा है कि जंगल काटकर की जा रही खेती से हर साल ‘कमीशन’ वसूला जा रहा है—यानी जंगल उजड़ रहा है, पर्यावरण नष्ट हो रहा है और सब कुछ सिस्टम की आंखों के सामने।

दैनिक भास्कर की टीम जब कोतरा डंगरी से बंद पारा चौक तक लगभग 20–25 किलोमीटर का सफर के भीतर का दृश्य झकझोर देने वाला था।
जहां कभी हरियाली थी, वहां अब जंगल की छाती चीरती सड़कें, सड़क के दोनों ओर कटे हुए पेड़, और दूर-दूर तक मक्का से भरे बड़े-बड़े कोठार दिखाई दिए।


सबसे डरावनी बात—पूरे सफर में न कोई बंदर दिखा, न पक्षी, न किसी जीव की आवाज। नदियों की कलकल भी खामोश थी।
अगर कुछ सुनाई दे रहा था, तो बस कुल्हाड़ी की आवाज और पेड़ों के गिरने की आवाज।

टीम के दौरे के दौरान ही कई जगह जंगल की अवैध कटाई होती हुई दिखी। इतने बड़े क्षेत्र में एक भी वनरक्षक या बीट गार्ड का नजर न आना वन विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
जब यह जंगल संरक्षित श्रेणी में आता है, तो फिर यहां यह सब किसके संरक्षण में हो रहा है?

 

सूत्र बताते हैं कि इन अवैध बस्तियों में रहने वाले परिवारों ने कम से कम 5 से 7 एकड़, और कई मामलों में 15–20 एकड़ तक जंगल काटकर ज़मीन बना ली है।


अनुमान है कि तीन–चार गांवों में करीब 200 से अधिक परिवार यहां रह रहे हैं। यानी हजारों एकड़ जंगल पर लगातार कुल्हाड़ी और हल चल रही है—और यह सिलसिला 2009 से अब तक बदस्तूर जारी है।

एक और गंभीर आरोप यह भी है कि इन इलाकों में वन्य प्राणियों का शिकार किया जा रहा है। यही कारण है कि आज यह जंगल ‘साइलेंट ज़ोन’ बन चुका है—न पक्षी, न जानवर, सिर्फ फसल और डर।

स्थानीय मक्का व्यापारियों और किसानों के लिए भी यह हैरानी की बात थी कि अमलीपदर क्षेत्र में अचानक मक्का की खेती इतनी कैसे बढ़ गई। जांच में सामने आया कि इसका सीधा संबंध जंगल काटकर खेती करने से है।

जब इस संबंध में खरीपथरा के सरपंच पुनीत ध्रुव से बात की गई, तो उन्होंने बताया—
“करीब 10–15 साल पहले जहां घना जंगल था, वहां आज खेती और बसाहट है। उड़ीसा और बस्तर से लोग आकर बस रहे हैं। हैरानी यह है कि जिन गांवों के नाम आप ले रहे हैं, उनका जिक्र किसी भी सरकारी दस्तावेज़ में नहीं है, फिर भी कहीं सोलर प्लेट, कहीं राशन जैसी सुविधाएं पहुंच रही हैं।”

दूसरी ओर, सामान्य वन मंडल के जिला अधिकारी सच्चिगानंद के. जी से जब फोन पर सवाल किया गया, तो उनका जवाब था—
“मैं एसडीओ के माध्यम से जांच कराऊंगा कि बीट क्षेत्र में कहां-कहां अवैध खेती और बसाहट है।”

लेकिन सवाल सिर्फ जांच का नहीं है। सवाल यह है कि सालों तक जंगल कटता रहा, गांव बसते रहे, खेती होती रही—और किसी को भनक तक नहीं लगी?
क्या यह लापरवाही है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?

सबसे बड़ा खेल पट्टे का बताया जा रहा है। पहले जंगल काटो, ज़मीन पर कब्जा करो, सालों तक पेशी लड़ो और कुछ दिन जेल में गुजारो और फिर जैसे ही किसी तरह पट्टा मिलता है, उसके बाद आगे और नया जंगल काटकर अगली पीढ़ी के लिए नया जमीन का पट्टा मिलने तक का रास्ता साफ किया जाता है।
यही परंपरा दशकों से चल रही है—और इसका खामियाजा जंगल, पर्यावरण और वन्यजीव भुगत रहे हैं।

आज सवाल साफ हैं—

क्या वन विभाग सच में अनजान है? या सब जानते हुए भी चुप्पी साधे बैठा है और सरकार कब इस अवैध खेल का संज्ञान लेगी? कब खाली होंगे ये अवैध गांव?

कागज़ों में पर्यावरण संरक्षण की योजनाएं हैं, लेकिन ज़मीन पर जंगल कट रहे हैं।
अब देखना यह है कि यह रिपोर्ट सिर्फ एक खबर बनकर रह जाती है,
या फिर कोतरा डंगरी और खरी पथरा का जंगल इंसाफ़ की सांस ले पाता है।

Facebook
Twitter
WhatsApp
Reddit
Telegram

Leave a Comment

Powered by myUpchar

Weather Forecast

DELHI WEATHER

पंचांग