भ्रष्टाचार का कुआं खोदता जेसीबी मशीन !
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
ग्राम पंचायत मदांग मुंडा में नरेगा के तहत कुआं नहीं, बल्कि व्यवस्था की नीयत खोदी जा रही है। धनशाय और घासीराम के नाम पर ₹2,80,000 का सरकारी कुआं स्वीकृत हुआ था— ताकि गांव के बेरोजगार युवक-युवतियां फावड़ा और घमेला उठाकर अपने ही गांव में रोज़गार कमा सकें।लेकिन मैदान में न फावड़ा दिखा, न घमेला। मैदान में उतरी एक ही चीज़— गर्जना करती जेसीबी।

फावड़ा-घमेला लाइन में, जेसीबी मैदान में
यही है पंचायत का ‘विकास मॉडल’
जिन हाथों को काम मिलना था, वे हाथ आज भी खाली हैं। जिन युवाओं को मिट्टी से रोज़ी निकालनी थी, वे आज किनारे खड़े तमाशा देख रहे हैं और सोच रहे हैं गांव में रहने से तो अच्छा है विदेश जाकर काम करें । बीच मैदान में जेसीबी मशीन ऐसे दहाड़ रही है,जैसे हर वार के साथ बेरोजगारों के मुंह पर शक्त तमाचा जड़ रही हो।
काम मजदूरों का, शोर मशीन का,
और बिल नरेगा का।
₹2,80,000 का कुआं और मुफ्त की बेरोज़गारी । धनशाय-
घासीराम के नाम पर चला ‘मशीन राज’
नरेगा के नियम कहते हैं—
काम मशीन से नहीं, मजदूर से होगा।
लेकिन मदांग मुंडा में नियमों को जेसीबी के ट्रैक के नीचे रौंद दिया गया।
पहले मशीन से कुआं खोदो,
फिर रजिस्टर में मजदूरों के नाम भरो,
और अंत में सीना ठोककर कह दो—
“सब नरेगा से हुआ है।”
यहां सवाल ये नहीं कि कुआं बना या नहीं,
सवाल ये है—किसके हाथों से बना?

मीडिया आई तो सिस्टम जागा
वरना सब ‘मिट्टी में दबा’ रहता
जैसे ही बस्तर की माटी न्यूज़ की टीम को खबर मिली और कैमरा मौके पर पहुंचा, वैसे ही व्यवस्था ने अंगड़ाई ली।
जनपद से बयान आया— “जांच करेंगे।”
लेकिन सवाल अब भी जमीन में गड़ा है—
अगर कैमरा नहीं आता, तो क्या ये जेसीबी रुकती? क्या धनशाय और घासीराम के नाम का यह काम यूँ ही मशीन के हवाले चलता रहता?
ये कुआं नहीं, सिस्टम का आईना है
मदांग मुंडा का यह कुआं सिर्फ मिट्टी की खुदाई नहीं,यह उस सिस्टम की तस्वीर है
जहां ₹2,80,000 स्वीकृत होते हैं,
लेकिन रोजगार शून्य रहता है।
जब तक जेसीबी फावड़े की जगह लेती रहेगी,जब तक फाइलें सच्चाई ढकती रहेंगी,तब तक नरेगा का मतलब रहेगा—
काम कागजों में,और बेरोजगारी जमीन पर। सिस्टम अगर नहीं बदला,तो एक दिन जनता फावड़ा उठाकर जरूर सवाल खोद लेगी और पूछेगी रामराज कब आएगी ?

