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विश्व जल दिवस पर बड़ा सवाल: अमली पदर क्षेत्र का सबसे बड़ा जलाशय सूखा, सिंचाई विभाग की लापरवाही उजागर

अमलीपदर, 22 मार्च – आज जब पूरा विश्व जल दिवस मना रहा है, तब अमली पदर क्षेत्र के सबसे बड़े जलाशय में एक बूंद पानी न होना एक गंभीर विडंबना है। करीब 100 एकड़ में फैले इस जलाशय को करोड़ों रुपये की लागत से बनाया गया था, ताकि यह क्षेत्र की जल आपूर्ति, सिंचाई और मत्स्य पालन का एक प्रमुख केंद्र बन सके। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही और रखरखाव की कमी के चलते यह जलाशय पूरी तरह सूख चुका है।

मुख्य कारण: जलाशय का मुख्य द्वार वर्षों से खुला

जांच में पता चला है कि बीते तीन वर्षों से जलाशय का मुख्य द्वार (गेट) बंद नहीं किया गया, जिससे जल संचय नहीं हो सका। यह जलाशय उदंती नदी से जोड़ने की योजना का भी हिस्सा है, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखकर इस परियोजना पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

प्रभावित हुए किसान और वन्यजीव

यह जलाशय न सिर्फ किसानों के लिए सिंचाई का साधन था, बल्कि आसपास के जंगलों के जीव-जंतुओं के लिए भी महत्वपूर्ण था। इसके अलावा, यहां मत्स्य पालन कर कई परिवार अपनी आजीविका चलाते थे। लेकिन अब जलाशय में पानी न होने से ये सभी गतिविधियां ठप हो गई हैं।

सिंचाई परियोजना भी अधर में

सरकार ने इस जलाशय से करीब 300 एकड़ भूमि को साल में दो बार सिंचित करने की योजना बनाई थी। लेकिन बीते 10 वर्षों में केवल एक बार ही किसानों को इसका लाभ मिल पाया। जलाशय से जुड़ी नहरें तो बना दी गईं, लेकिन रखरखाव की कमी और जल प्रबंधन की लचर व्यवस्था के चलते ये बेकार साबित हो रही हैं।

जनता की मांग: जलाशय को पुनर्जीवित किया जाए

क्षेत्र की जनता ने सरकार से मांग की है कि जलाशय के मुख्य द्वार को बंद किया जाए ताकि बारिश के दौरान पानी को एकत्र किया जा सके। इससे किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिल सकेगा, वन्यजीवों को जीवनदान मिलेगा और मत्स्य पालन को भी बढ़ावा मिलेगा।

सिंचाई विभाग  की चुप्पी सवाल  के घेरे में

इतनी गंभीर समस्या के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। अगर जल्द ही उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो यह जलाशय पूरी तरह बेकार साबित होगा और सरकार का करोड़ों रुपये का निवेश व्यर्थ चला जाएगा।

अब सवाल यह उठता है कि जब जल संकट गहराता जा रहा है, तब ऐसे जलाशयों की अनदेखी क्यों की जा रही है? सरकार और प्रशासन को जल्द से जल्द इस मुद्दे पर ध्यान देना होगा, ताकि जल संरक्षण की इस महत्वपूर्ण परियोजना को पुनर्जीवित किया जा सके।

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