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आदिवासी समाज की उपेक्षा पर चिंता राजू सोढ़ी

कृष्ण कुमार कुंजाम 

बस्तर बस्तर के माटी समाचार आज विश्व आदिवासी दिवस के ठीक 2 दिन बाद मैं राजू सोढ़ी एक आदिवासी समुदाय का सदस्य होने के साथ-साथ राजनीति रूप से जनपद सदस्य होने के नाते आदिवासी समाज के निरंतर उपेक्षा पर गहरी चिंता व्यक्त करता हूं, संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस 9 अगस्त को मनाया जाता है और इस वर्ष 2025 में यह 31वां विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन था जिसकी शुरुआत 1994में हुई थी।
*यह विडंबना है कि* भारत जैसे देश में आदिवासी समुदाय की आबादी करोड़ों में एवं प्रतिशत में लगभग 8% है वे आज भी शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार और भूमि अधिकारों न्याय जैसे बुनियादी मुद्दों पर उपेक्षित हैं
देश के राष्ट्रपति माननीया द्रोपति मुर्मू जो खुद आदिवासी जो खुद आदिवासी समुदाय से हैं और प्रदेश मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आदिवासी होने के बावजूद मूल निवासी समाज की मूलभूत स्थिति में सुधार नहीं आया है सरकारी योजना कागजों तक सीमित रह जाती हैं और जमीनी स्तर पर आदिवासी लोगों को वन अधिकार ,जल जंगल, जमीन के संरक्षण और विकास ,रोजगार ,बेहतर शिक्षा ,स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखा जा रहा है
*विशेष रूप से* देश के राष्ट्रपति मान्य द्रौपदी मुर्मू एवं प्रदेश मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के द्वारा 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस पर बधाई संदेश तक ना दिया जाना और भी चिंताजनक है और आदिवासी समाज आज भी *देश का वास्तविक मालिक* होने के बावजूद तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित महसूस कर रहा है मानो जैसे अधिकार बस औपचारिक हों।
*हम मांग करते हैं कि*
1.पेसा एक्ट का शक्ति से पालन हो ।
2. फर्जी मुठभेड़ एवं गिरफ्तारियां की जांच हो निर्दोष आदिवासियों को रिहा किया जाए।
3. बस्तर आदिवासी क्षेत्र में क्राइम रेट कम करने के लिए शांतिपूर्ण समाधान अपनाया जाएं
4. वन अधिकार अधिनियम 2006 का शक्ति से पालन हो
5. आदिवासियों की अलग से धर्म कोड साथ ही साथ जाति जनगणना में अलग विशेष कंडिका टोटम आधारित जनगणना करवाई जाए
मैं नागरिकों मीडिया और सरकारी अधिकारियों से अपील करता हूं कि मूल निवासियों की आवाज सुने और उनके हकों के लिए निस्वार्थ सेवा दें। यह 31वां दिवस हमें याद दिलाता है कि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है

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