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इंदा गांव में फिर लौटा ‘फांसी का पिशाच’ । फिर गई एक युवक की जान । पुरानी जख्म फिर हरे ।

तीन महीने पहले 13 आत्महत्याओं से हिला था देश

बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS) ,गरयाबंद

इंदा गांव_ तीन महीने की खामोशी के बाद इंदिरा गांव में एक बार फिर आत्महत्या का साया मंडराने लगा है। शुक्रवार को गांव के 35 वर्षीय रॉबिन ध्रुव, निवासी पुजारीपारा, का शव फांसी के फंदे से लटका मिला। यह घटना केवल एक मौत नहीं, बल्कि एक पूरे समुदाय के जख्मों को फिर से कुरेदने वाली त्रासदी है।

तीन महीने पहले हिली थी देश की आत्मा

याद दिला दें, महज़ तीन महीने पहले यही गांव देशभर में सुर्खियों में आया था, जब 18 दिनों के भीतर 13 आत्महत्या की घटनाओं ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। उस समय प्रशासन हरकत में आया, नशे के अड्डों पर शिकंजा कसा, अवैध शराब और देसी दारू के कारोबार पर प्रतिबंध लगाया। साथ ही, गांव में जागरूकता बैठकें, ग्राम देवी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और चिकित्सकों की टीम भेजकर आत्महत्या की लहर को रोकने की कोशिश की गई थी।

पुराने जख्म फिर हरे, गांव में मातम

नई घटना के बाद गांव में मातम पसरा हुआ है। जिन परिवारों ने तीन महीने पहले अपने बेटों और भाइयों को खोया था, उनके आंसू फिर से बह निकले। लोग अब एक बार फिर उस डर और असहायता के माहौल में जीने को मजबूर हो गए हैं। “हमने सोचा था कि बुरे दिन खत्म हो गए, लेकिन आज लगता है कि कुछ भी नहीं बदला,” भुजबल ध्रुव, बुजुर्ग ग्रामीण

सरकार और प्रशासन पर सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या प्रशासन एक बार फिर गांव में आत्महत्या रोकने के लिए अभियान चलाएगा?

क्या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम वापस भेजी जाएगी?

क्या नशे के अड्डों पर फिर से कार्रवाई होगी?

क्या आत्मविश्वास और आशा जगाने वाले कार्यक्रम गांव में होंगे?
या फिर तीन महीने पहले की तरह चकाचौंध भरे ‘तुरंत समाधान’ के बाद गांव को फिर अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा?

गांव के युवाओं का कहना है कि प्रशासन की कार्रवाइयां अस्थायी साबित हो रही हैं। “जब तक मीडिया और अफसरों का ध्यान रहता है, तब तक सख्ती होती है, उसके बाद सब पहले जैसा हो जाता है,” एक स्थानीय युवक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा।

मानसिक स्वास्थ्य पर स्थायी ध्यान की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नशे पर रोक या पूजा-अर्चना से समस्या हल नहीं होगी। ज़रूरत है मानसिक स्वास्थ्य को लेकर स्थायी व्यवस्था की—गांव में काउंसलिंग सेंटर, हेल्पलाइन नंबर, और नियमित मनोवैज्ञानिक सहायता। उनका कहना है “आत्महत्या केवल नशे का परिणाम नहीं, बल्कि कई सामाजिक, आर्थिक और मानसिक दबावों का मिश्रण है,”

ग्रामीणों का साफ संदेश है—हमें थोड़े समय के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय तक सहयोग चाहिए। ग्राम के महिला टेक शीला ध्रुव ने कहा, “हमने तीन महीने पहले भी अपने घर के बेटे को खोया था, और अब फिर एक बेटा चला गया। अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो हम नहीं जानते कि आगे कितने और घर उजड़ेंगे।”

सरकार से सीधा सवाल

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि केवल तात्कालिक कार्रवाई से समस्या का हल नहीं निकलता। सरकार को यह तय करना होगा कि क्या वह इंदिरा गांव और ऐसे अन्य प्रभावित इलाकों के लिए कोई स्थायी नीति बनाएगी या नहीं।
क्या ग्रामीणों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की गारंटी केवल कागजों पर ही रह जाएगी?
समाज और सरकार, दोनों के लिए यह चेतावनी है—अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ‘फांसी का पिशाच’ और कितनी जिंदगियां निगल जाएगा, कहना मुश्किल है।

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