प्रधानमंत्री सड़क पर ‘भारी’ सवाल_दो साल में जर्जर सड़क । 50–60 भारी वाहनों की खुली आवाजाही, विभाग मौन !
बोर्ड लगा ‘मनाही’, हकीकत में हाईवा के “आवाजाही” पुलिस-राजस्व-खनिज विभाग की चुप्पी पर सवाल _ घटिया निर्माण या तगड़ी सेटिंग?
आवेदन के बाद PMGSY सड़क का मरम्मत कार्य शुरू
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
ध्रुवापारा से तेल नदी, उड़ीसा सीमा तक लगभग 2.3 किलोमीटर लंबी लगभग एक करोड़ का लागत से बना प्रधानमंत्री ग्राम सड़क महज दो साल में ही अति-जर्जर हो चुकी है। सवाल यह नहीं कि सड़क खराब क्यों हुई, सवाल यह है कि आखिर किसकी नाक के नीचे यह सब होता रहा और किसके संरक्षण में?

यह वही सड़क है, जिसे ग्रामीणों की जीवनरेखा कहा गया था, लेकिन आज वही सड़क प्रशासनिक उदासीनता, घटिया निर्माण और खुलेआम नियमों की अनदेखी की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। जब इस जर्जर सड़क की तस्वीरें लगभग सभी समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रकाशित हुईं, तब जाकर विभाग हरकत में आया। धराकोट में आयोजित जिला स्तरीय जनसमस्या शिविर में ग्रामीणों की शिकायत के बाद, उसी दिन प्रधानमंत्री सड़क योजना के कार्यपालन अभियंता (ईई) अभिषेक पाटकर मौके पर पहुंचे और निरीक्षण किया।


निरीक्षण के दौरान सड़क की खराब हालत की पुष्टि हुई। जब कारणों की पड़ताल की गई, तो एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई। ई ई ने मौके में हीं उड़ीसा की ओर चल रहे सड़क निर्माण कार्य के लिए भारी-भरकम हाइवा ट्रक, गिट्टी, मुरूम और अन्य निर्माण सामग्री लेकर, छत्तीसगढ़ की इसी प्रधानमंत्री सड़क का धड़ल्ले से उपयोग करते हुए देखे । जबकि सड़क के शुरुआती बिंदु पर साफ-साफ लिखा है— “भारी वाहनों का आवागमन निषेध”।

ईई पाटकर ने ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि नियमों के अनुसार मरम्मत कराई जाएगी और भविष्य में पंचायत प्रस्ताव पारित कर भारी वाहनों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था की जाए, ताकि सड़क फिर से जर्जर न हो। उनके आश्वासन के अनुसार मरम्मत कार्य शुरू भी हो गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मरम्मत से समस्या सुलझेगी या समस्या के मूल कारणों पर कार्रवाई होगी?

नाक के नीचे खेल_ उड़ीसा के ठेकेदार, छत्तीसगढ़ की सड़क और रॉयल्टी को ठेंगा
ग्रामीणों का आरोप है कि दिन में 50 से 60 हाइवा ट्रक इसी सड़क से उड़ीसा सीमा की ओर गुजरते हैं। रॉयल्टी का झांसा देकर उड़ीसा में सड़क बना रहे ठेकेदार, छत्तीसगढ़ की सड़क का उपयोग करते हुए न केवल सड़क को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि खनिज रॉयल्टी को भी ठेंगा दिखा रहे हैं। नियम यही कहता है कि अगर अन्य राज्य के हाईवा अगर परिवहन के लिए सड़क का इस्तेमाल करें तो बाकायदा उसे भी रॉयल्टी देना चाहिए जिस राज्य का सड़क का वह इस्तेमाल कर रहा है। जीससे एक तरफ राज्य की संपत्ति—सड़क—नष्ट हो रही है, तो दूसरी तरफ सरकार को मिलने वाला राजस्व भी हाथ से निकल रहा है।

यहां सवाल सीधे-सीधे पुलिस विभाग, राजस्व विभाग और खनिज विभाग पर खड़े होते हैं। मुख्यालय देवभोग से होकर गुजरने वालेदिनभर में 50–60 भारी वाहनों की आवाजाही किसी को नजर नहीं आती? क्या पुलिस चेकिंग, राजस्व निरीक्षण और खनिज विभाग की निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित है? या फिर यह सब जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है?
लोगों के बीच चर्चा यह भी है कि उड़ीसा में सड़क निर्माण कर रहे ठेकेदार को देवभोग क्षेत्र के एक बड़े ठेकेदार का संरक्षण प्राप्त है। इसी “तगड़ी सेटिंग” के चलते न तो पुलिस, न राजस्व और न ही खनिज विभाग की नजर इन हाइवा ट्रकों पर पड़ती है। नतीजा—प्रधानमंत्री सड़क योजना की सड़क दो साल में ही जवाब दे चुकी है।

दूसरा अहम सवाल निर्माण गुणवत्ता पर भी उठ रहा है। अगर सड़क सही मानकों और गुणवत्ता से बनी होती, तो क्या वह महज दो साल में इस कदर टूट जाती? घटिया सामग्री के इस्तेमाल की आशंका भी अब जोर पकड़ रही है, जिसे विभागीय जांच में सामने लाया जाना जरूरी है।
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं। क्या मरम्मत के बाद भी इसी तरह भारी वाहनों का आवागमन जारी रहेगा? या फिर इस खबर के बाद पुलिस, राजस्व और खनिज विभाग जागेगा और अवैध परिवहन पर सख्त कार्रवाई करेगा? क्या उड़ीसा में निर्माण के नाम पर छत्तीसगढ़ की सड़क और रॉयल्टी की लूट यूं ही चलती रहेगी?

यह मामला सिर्फ एक सड़क का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, कानून के पालन और सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता का है। अगर आज कार्रवाई नहीं हुई, तो कल ऐसी ही सड़कों की कतार लग जाएगी। अब देखना यह है कि सरकार और विभाग आंख खोलते हैं या फिर आंख मूंदकर राज्य की सड़कों को फिर से खराब होने देते हैं।

