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39 से 60 रुपये तक FRK की कीमत! टेंडर बदलाव से स्थानीय उद्योगों पर संकट

 

रायपुर। बस्तर के माटी छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत बांटे जाने वाले फोर्टिफाइड चावल के लिए खरीदे जाने वाले फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) का टेंडर विवादों के घेरे में आ गया है। राज्य विपणन संघ (मार्कफेड) द्वारा वर्ष 2025-26 के लिए जारी किए गए टेंडर की शर्तों में अचानक किए गए एकतरफा बदलाव ने प्रदेश के 80 प्रतिशत स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया है। इस ‘खेल’ से न केवल स्थानीय छोटे और मध्यम उद्योगों पर आर्थिक संकट मंडराने लगा है, बल्कि सरकारी खजाने पर भी सालाना लगभग 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है।

 

क्या है पूरा मामला?

 

मार्कफेड इस साल लगभग 84 हजार मीट्रिक टन FRK खरीदने की तैयारी कर रहा है। अब तक इसकी खरीदी लगभग 39 रुपये प्रति किलो की दर से की जाती रही है। लेकिन, 2025-26 के जारी नए टेंडर में ऐसी शर्तें जोड़ी गईं, जिससे FRK की कीमत 60 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की आशंका है। आरोप है कि ये शर्तें कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों और बाहरी राज्यों के मिलर्स को फायदा पहुंचाने के लिए तैयार की गई हैं, जिससे प्रदेश के छोटे उद्यमी मुकाबले से ही बाहर हो गए हैं।

 

स्थानीय उद्योगों पर संकट, बड़े मिलर्स को फायदा पहुंचाने का आरोप

 

नई शर्तों के कारण प्रदेश के अधिकांश स्थानीय FRK प्लांट अयोग्य हो गए हैं और केवल 20 प्रतिशत बड़े मिलर्स ही टेंडर प्रक्रिया में शामिल हो पाए हैं। राइस मिलरों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि यह कदम सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ के भंडार क्रय अधिनियम का उल्लंघन है और स्थानीय उद्योगों को खत्म करने की साजिश है। उनका कहना है कि टेंडर की शर्तों में इतने बड़े बदलाव के लिए कम से कम 15 दिनों का अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए था, जो नहीं दिया गया।

 

खड़े हो रहे हैं गंभीर सवाल

 

क्या 20% मिलर्स कर पाएंगे पूरे प्रदेश की सप्लाई? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चयनित मिलर्स पूरे प्रदेश की 84 हजार मीट्रिक टन की जरूरत को समय पर पूरा कर पाएंगे? इससे भविष्य में आपूर्ति की समस्या खड़ी हो सकती है।

 

भुगतान की जटिल प्रक्रिया: नई शर्तों के अनुसार, राइस मिलरों को चयनित सप्लायरों से 60 रुपये प्रति किलो की दर से FRK खरीदना होगा और उसका भुगतान तुरंत करना होगा। वहीं, सरकार द्वारा मिलरों को इस राशि का भुगतान 1 से 2 साल बाद किया जाएगा। इतनी लंबी भुगतान अवधि छोटे और मध्यम मिलरों की कमर तोड़ देगी।

 

खजाने पर क्यों डाला जा रहा बोझ? जब बाजार में FRK 39 रुपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध है, तो सरकार 60 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदी को क्यों बढ़ावा दे रही है? इससे सरकारी खजाने पर पड़ने वाले 175 से 200 करोड़ रुपये के अतिरिक्त बोझ का जिम्मेदार कौन होगा?

 

यह मामला अब सिर्फ एक टेंडर प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रदेश की औद्योगिक नीति, स्थानीय उद्यमिता और सरकारी खजाने से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बन गया है, जिस पर सरकार को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

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