भूख पहुंचा दिया मौत के मुंह तक । दर्द पीकर मर गया नन्हा गजराज
पोटाश बम से एक और गजराज की हत्या
मुंह और पेट में विस्फोट, दर्द सहता रहा और जिंदगी हार गया हाथी का बच्चा
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद

भूख…जिसे इंसान मामूली समझता है,
वही भूख आज एक मासूम गजराज की मौत की वजह बन गई।
उड़ीसा के अनुगुल ज़िले के बंदतला क्षेत्र से एक ऐसी हृदय विदारक घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
करीब 5 साल का एक नन्हा हाथी, भोजन की तलाश में जंगल से भटकते हुए गांव के पास पहुंचा। उसे क्या पता था कि जो वह खाने जा रहा है, वह भोजन नहीं बल्कि मौत का बम है।

पोटाश बम, जिसे शिकार के लिए लालची इंसानों ने बिछाया था,उसे हाथी ने भोजन समझकर चबा लिया।
और फिर—
एक भयानक धमाका…मुंह फट गया,
पेट के अंदर जलन और असहनीय दर्द शुरू हो गया।वह चीखा नहीं…
वह हिंसक नहीं हुआ…
वह बस डर से कांपता रहा,दर्द सहता रहा,

खामोशी से मौत से लड़ता रहा।
वन विभाग को जब वह मिला,
तो उसका मुंह जख्मों से भरा था,
आंखों में डर था,और शरीर में असहनीय पीड़ा।उसे एंबुलेंस से बेहतर इलाज के लिए ले जाया जा रहा था,लेकिन रास्ते में ही वह जिंदगी की जंग हार गया।
यह कोई पहली घटना नहीं है।

जून 2020 में केरल के पालघाट में
गर्भवती हथिनी ने पोटाश बम खा लिया,
पेट की जलन से राहत पाने तालाब में उतरी,और वहीं तड़प-तड़प कर मर गई—
उसके साथ उसके गर्भ में पल रहा बच्चा भी।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में
बीते वर्ष इसी तरह पोटाश बम से एक हाथी की मौत हुई।हर बार वही कहानी,
हर बार वही दोषी—मानव की लालच।

अनुगुल के डीएफओ ने जांच और दोषियों पर कार्रवाई की बात कही है,
लेकिन सवाल यह है— *कब तक गजराज ऐसे ही मरते रहेंगे?*
*क्या जंगल भी अब उनके लिए सुरक्षित नहीं रहे?*
वन्यजीव संरक्षण केवल कानून नहीं,
संवेदना का विषय है।पोटाश बम कोई साधारण जाल नहीं,यह एक मौन हत्या का हथियार है,जो हाथियों जैसे निर्दोष जीवों की जान ले रहा है।

ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए,
पोटाश बम पर सख़्त प्रतिबंध और निगरानी जरूरी है,गांवों में जागरूकता अभियान चलाना अनिवार्य है।
क्योंकि—
अगर इंसान नहीं बदला,तो जंगल भी खामोश हो जाएंगे…और गजराज सिर्फ तस्वीरों में रह जाएंगे।

