नल-जल मिशन का ‘हैंडपंप मॉडल’ – टंकी खड़ी, पानी गायब!”
“बिजली नहीं तो क्या हुआ? हैंडपंप से टंकी भरने की ‘नई टेक्नोलॉजी’ तैयार!”सागड़ा गांव की अनोखी कहानी”
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक का सागड़ा गांव इन दिनों किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला से कम नहीं लग रहा। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां प्रयोग लैब में नहीं, सीधे जनता की प्यास पर हो रहा है।

सरकार ने बड़े-बड़े वादों के साथ “हर घर नल, हर घर जल” का सपना दिखाया…
गांव में टंकी भी खड़ी कर दी गई… पाइप भी बिछा दिए गए… नल भी लगा दिए गए…
बस एक छोटी सी चीज छूट गई — पानी!

अब आप सोच रहे होंगे कि चलो, देर-सवेर पानी आ ही जाएगा…
लेकिन, यहां तो कहानी ही अलग लेवल की है।
“सबमर्सिबल गया छुट्टी पर, हैंडपंप आया ड्यूटी पर”
जहां सबमर्सिबल मोटर लगना था, वहां विभाग ने एक नया इनोवेशन कर दिया —सीधे बोर में हैंडपंप फिट!

अब सवाल ये उठता है कि_क्या हैंडपंप खुद टंकी तक पानी चढ़ाएगा?
_ या गांव वाले लाइन लगाकर बाल्टी-बाल्टी पानी भरकर टंकी तक रिले रेस खेलेंगे?
_ या फिर विभाग ने कोई “ब्लूटूथ वाटर ट्रांसफर टेक्नोलॉजी” इजाद कर ली है?
गांव वाले भी अब इंतजार में हैं —
शायद कल कोई अधिकारी आए और बताए_“बस 2-3 बार हैंडपंप चलाओ… पानी अपने आप टंकी में WiFi से पहुंच जाएगा!”
“बिजली नहीं थी… पर टंकी बना दी!”
विभाग का कहना है कि तीन-फेज बिजली नहीं है, इसलिए मोटर नहीं लग पाया। एक हैंड पंप टेंपरेरी लगाया गया है ताकि लोगों का पानी का कमी ना हो ।
अब जनता पूछ रही है_
_जब बिजली नहीं थी, तो टंकी क्यों बना दी?
_ 2 साल तक आवेदन करने का टाइम नहीं मिला या बिजली भी टेंडर में फंसी है?
_टंकी के पास में मोटर घर भी बना है पर मोटर और बिजली नहीं है क्यों?

अन्य गांव में जहां नल जल योजना के अंतर्गत पानी नहीं मिल पा रही है तो वहीं पर विभाग का कहना है कि उसे पॉइंट पर बोर फेलियर है । पानी की मात्रा कम है ।पर सागड़ा गांव का जी टंकी के हम बात कर रहे हैं वहां पर, बोर भी सक्सेस है पानी भी 3 इंच से ज्यादा है फिर भी यहां पर बोर नहीं लग पाया। इससे विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे है ।
यानी योजना पहले… सोच बाद में!
“पानी के लिए संघर्ष, जुगाड़ से जीवन”
गांव में अमीरों ने अपने बोर खुदवा लिए…गरीब आज भी सरकारी हैंडपंप या तालाब के भरोसे हैं। कहीं बाल्टी से पानी ढोया जा रहा है,
तो कहीं लोग आसमान देखकर बादलों से डील करने की सोच रहे हैं।
“टंकी का नया उपयोग – सिग्नल टॉवर और लैंडमार्क के पहचान “

गांव की टंकी अब पानी देने से ज्यादा अन्य कामों में उपयोगी साबित हो रही है जैसे _
_ मोबाइल सिग्नल पकड़ने का टॉवर_ गांव पहचानने का निशान
_दिशा बताने का GPS साधन और Selfie point
लोग अब कहने लगे हैं “अरे भाई, हमारा गांव वही है… जहां दूर से नीली टंकी दिखती है!”
हमारे देश में सब कुछ पॉसिबल है यहां सभी विभाग पहले से कुछ विकास कार्यक्रम नहीं सोचती जब कुछ बन जाए उसको तोड़ ताड़ कर दुनिया भर का योजना लाने में उस्ताद है जैसे पहले सड़क बनाते हैं उसके बाद उस सड़क को बीच में तोड़कर पाइपलाइन बिछाते हैं । जैसे यह भूल जाते हैं कि गांव में लोगों को पानी भी चाहिए होता है और जिसका कनेक्शन सड़क के किनारे,नीचे या सड़क के बीच से ऊपर जाता है फिर भी पहले सड़क बनता है बाद में पाइप लाइन खुद जाता है । कुछ साल बाद सड़क खराब और फिर से नई सड़क बनाने का कार्य शुरू। ऐसे कई सारे और उदाहरण है जिसका कुछ अच्छे काम बनने के बाद उसको तोड़ कर दूसरे विकास कार्य याद आता है ।
“विभाग का जादू कब चलेगा?”
सरकार गर्मी को लेकर अलर्ट है, लेकिन जमीनी हकीकत में विभाग का यह कारनामा ही काफी है सरकार की किरकिरी के लिए।
अब लोग इंतजार कर रहे हैं_
_कोई जादू की छड़ी घूमेगी…
_ या कोई अफसर आकर फाइल से पानी निकाल देगा…तब तक के लिए नल सूखा है, टंकी सूखी है… और उम्मीद भी आधी सूखी है।

