5 करोड़ का रीपा सेंटर… और उत्पादन मिर्च-मसाला तक सीमित!”
कलेक्टर भगवान सिंह ऊइके का अमलीपदर दौरा—जमीनी हकीकत पर तीखा तंज
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
गरियाबंद जिले के अमलीपदर में शुक्रवार को कलेक्टर भगवान सिंह ऊइके का दौरा हुआ—लेकिन यह दौरा कम और सिस्टम की परतें खोलने वाला निरीक्षण ज्यादा साबित हुआ।
सबसे पहले निरीक्षण हुआ सुखा तेल नदी पुलिया का। काम की रफ्तार देखकर साफ लगा कि यहां समय नहीं, बल्कि समय को ही इंतजार करवाया जा रहा है। कलेक्टर ने सख्त लहजे में कहा—“बारिश आने वाली है, काम में तेजी लाइए… विकास अब कछुए की चाल से नहीं चलेगा।”

इसके बाद कलेक्टर पहुंचे नवीन तहसील भवन, जो महज छह महीने में ही “पुराना स्मारक” बनने की दिशा में अग्रसर दिखा। धंसी टाइल्स, उखड़ा फर्श और फीका पड़ता रंग—मानो निर्माण नहीं, प्रयोग चल रहा हो। कलेक्टर ने नाराजगी जताते हुए निर्माण एजेंसी को गुणवत्ता सुधारने के निर्देश दिए।

लेकिन असली तस्वीर सामने आई 5 करोड़ की लागत वाले रीपा सेंटर में। यहां रोजगार के बड़े सपने दिखाए गए थे, लेकिन हकीकत मिर्च-मसाला और कभी-कभार टॉयलेट क्लीनर तक सिमटी नजर आई। ऊपर से तैयार माल एक्सपायरी के करीब—यानी उत्पादन से ज्यादा नुकसान का डर।
महिला स्व-सहायता समूह की आवाज भी गूंज उठी—
“सर, बिजली कनेक्शन जोड़ दीजिए… रोजगार का सवाल है।”
पुरानी मशीनों के सहारे आधुनिक उत्पाद बनाने की उम्मीद, खुद में एक चुनौति बन चुकी है।


आंकड़ों का खेल भी कम दिलचस्प नहीं—50 हजार की कमाई और ढाई लाख का बिजली बिल। यह योजना है या घाटे का मॉडल? हालात ऐसे कि आंधी आई और रीपा सेंटर की छत उड़ गई—मानो गुणवत्ता की जांच अब हवा खुद कर रही हो।

कलेक्टर ने सुझाव दिया कि इच्छुक लोग एमओयू के तहत प्रोजेक्ट शुरू करें, मशीनें अपग्रेड करें और रोजगार बढ़ाएं। बात सुनने में अच्छी है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी इंतजार में है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति तो और भी चौंकाने वाली है। पास में बना 30 बिस्तरों का नया अस्पताल ताले में बंद है—न डॉक्टर, न मरीज। और जो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, वहां संसाधनों की कमी अलग कहानी बयां कर रही है।
सबसे बड़ा अव्यवस्था एम्बुलेंस सेवा पर देखने को मिला। कागजों में 102 एंबुलेंस अमलीपदर के नाम पर तैनात है, लेकिन हकीकत में वह कहीं और सेवा दे रही है। इधर, एंबुलेंस मिलने की खुशी में नेताओं का “खींच मेरे फोटो” सेशन जरूर पूरा हो जाता है—
एंबुलेंस के पास खड़े होकर खींचा गया फोटो को व्हाट्सएप स्टेटस डालकर खुश होते है और वही मरिज किराए का एम्बुलेंस लेकर पैसा गिनने में दुखी नजर आता है । जमीन पर सच्चाई यह है कि जरूरतमंद मरीज आज भी एंबुलेंस के इंतजार में नहीं, बल्कि मजबूरी में पुराने तरीकों से घर पर ही डिलीवरी कराने को मजबूर हैं। कई मामलों में महिलाओं को निजी खर्च पर दूर के अस्पतालों तक जाना पड़ता है—यानी सुविधा कागजों में, संघर्ष हकीकत में।

मरीज अगर नए अस्पताल तक पहुंचना भी चाहे, तो 4 किलोमीटर का सफर खुद तय करे—शायद इसे ही “फिट इंडिया मिशन” का लोकल वर्जन मान लिया गया है।
सड़क किनारे अतिक्रमण पर भी कलेक्टर ने नाराजगी जताई और हटाने के निर्देश दिए। पहले भी कार्रवाई हुई थी, लेकिन हालात फिर धीरे-धीरे उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं।
कुल मिलाकर, अमलीपदर में विकास दूर से चमकता जरूर है…
लेकिन पास जाने पर टाइल्स की तरह उखड़ती हकीकत नजर आती है।
अब सवाल सीधा है—
क्या ये करोड़ों की योजनाएं यूं ही शोपीस बनी रहेंगी?
या इनमें सच में रोजगार, इलाज और व्यवस्था बसाई जाएगी?
फिलहाल, जनता की आवाज साफ है—
“साहब, इमारतें नहीं… व्यवस्था चालू कराइए!”

