बीजापुर में परंपरा के नाम पर खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ रही हैं!
बीजापुर बस्तर के माटी समाचार
विजा पंडूम के नाम पर सामूहिक शिकार—और जो नहीं जाएगा, उससे 1000 रुपये जुर्माना!
सवाल सीधा है—क्या जंगल अब कानून से नहीं, बल्कि दबाव और परंपरा से
अंदरूनी गांवों में संदेश साफ है—
“19 तारीख से वेटा जाना है… जो नहीं आएगा, वो जुर्माना देगा…”
इतना ही नहीं, आसपास के गांवों को भी फोन कर-करके बुलाया जा रहा है।
एक तरफ परंपरा… दूसरी तरफ कानून।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 साफ कहता है—
जंगल में शिकार करना अपराध है।
फिर भी, खुलेआम तैयारी… खुलेआम एलान…
तो सवाल—डर किस बात का नहीं है?
वन विभाग कहां है?
हर साल यही होता है—पंडूम आया, शिकार हुआ… और फाइलों में सब शांत!
क्या कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित है?
या फिर जिम्मेदार लोग जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं?
क्या परंपरा कानून से ऊपर हो सकती है?
क्या आदिवासी संस्कृति के नाम पर वन्यजीवों की हत्या सही है?
या फिर अब वक्त आ गया है सख्ती का?
ग्रामीणों का कहना—
“ये हमारी परंपरा है, सालों से चल रही है…”
लेकिन बदलते दौर में सवाल ये भी है—
क्या हर परंपरा को बिना बदलाव के जारी रखना सही है?
बीजापुर में जंगल का कानून कौन तय करेगा—सरकार या परंपरा?
फिलहाल जवाब हवा में है… और जंगल में खतरा कायम।

