पानी आया, बैरिकेड लगा, आश्वासन बहता रहा… अमलीपदर का अधूरा पुल फिर हार गया, जनता फिर पैदल!
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद
अमलीपदर के सुखा तेल नदी ने इस साल भी अपना काम समय पर कर दिया। बारिश हुई, नदी में पानी आया और आवागमन ठप हो गया। लेकिन अफसोस, जिस पुल का इंतजार क्षेत्रवासी वर्षों से कर रहे हैं, वह इस बार भी समय पर तैयार नहीं हो सका। नतीजा वही पुराना—पानी के इस पार जनता, उस पार जरूरी काम और बीच में बहताहुआ आश्वासन।


अमलीपदर में पुराने रपटे के ऊपर नया पुल निर्माणाधीन है। पुल बनने तक लोगों की सुविधा के लिए लगभग तीन वर्ष पहले एक डायवर्सन सड़क बनाई गई थी, लेकिन वह भी जमीन से तीन-चार फीट नीचे होने के कारण नदी में पानी बढ़ते ही डूब गई। प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से बैरिकेड लगा दिए हैं ताकि कोई नदी पार करने का जोखिम न उठाए।

अब सवाल यह है कि बैरिकेड तो लग गए, लेकिन लोगों के लिए रास्ता कहां है?
स्कूल के बच्चे, शिक्षक, बैंक कर्मचारी, ग्राहक, मरीज, डॉक्टर, नर्स, 108 एंबुलेंस और 112 जैसी आपातकालीन सेवाएं—सभी इस अधूरे पुल के कारण प्रभावित होने की आशंका में हैं। जिन बच्चों को किताबें पकड़नी चाहिए, वे अब पानी की गहराई नापने को मजबूर हैं। जिन मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचना चाहिए, उन्हें अब भगवान भरोसे सफर तय करना पड़ेगा।
सेतु निर्माण विभाग के कार्यपालन अभियंता संतोष कुमार पंडोले ने बताया कि पुल निर्माण की निर्धारित समय-सीमा दिसंबर तक है। हालांकि क्षेत्र की परेशानी को देखते हुए विभाग ने प्रयास किया था कि 1 जुलाई तक कम से कम बाइक और पैदल यात्रियों के लिए पुल चालू कर दिया जाए, लेकिन एक माह पहले आई डीजल समस्या के कारण यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि कर्मचारी दिन-रात काम कर रहे हैं और जल्द से जल्द लोगों के लिए पुल खोलने का प्रयास किया जाएगा।

लेकिन जनता का सवाल अलग है। यदि बारिश हर साल तय समय पर आती है, तो फिर निर्माण कार्य समय पर क्यों शुरू नहीं हुआ? यदि कलेक्टर ने बार-बार निर्देश दिए थे कि 1 जुलाई से पहले पुल तैयार किया जाए, तो फिर वे निर्देश फाइलों में ही क्यों रह गए?

अब बहस शुरू हो चुकी है—दोषी कौन है? डीजल की कमी, देर से शुरू हुआ निर्माण कार्य, ठेकेदार की कार्यशैली, विभागीय सुस्ती या फिर हर साल की तरह “सब ठीक हो जाएगा” वाला सरकारी भरोसा?
हकीकत यह है कि समस्या चाहे किसी की भी हो, कीमत क्षेत्र की जनता चुका रही है। अब लोगों को रायपुर या देवभोग जाने के लिए लगभग 12 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय कर गौहरापदर होकर जाना पड़ेगा।

गौरतलब है कि पहले इस पुल का निर्माण समय पर पूरा नहीं होने पर तत्कालीन ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर पुनः टेंडर जारी किया गया था। इसके बाद वेदांत कंस्ट्रक्शन को लगभग 5 करोड़ रुपये की लागत वाले इस अधूरे पुल को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। विभाग ने दावा तो किया कि इस बार स्थिति नहीं दोहराई जाएगी, लेकिन बारिश ने फिर वही पुरानी कहानी दोहरा दी।

सुखा तेल नदी पर पानी हर साल समय पर पहुंच जाती है, लेकिन विकास आज भी रास्ता तलाश रहा है।
पानी समय पर आया, बैरिकेड भी समय पर लग गए, बस समय पर काम नहीं आया तो वह पुल, जिसका इंतजार हजारों लोग कर रहे थे।
और आखिर में एक सवाल, जो अब क्षेत्र की जनता पूछ रही है—
अगर लगभग 5 करोड़ रुपये का पुल बारिश के मौसम में लोगों के काम ही न आए, तो फिर वह सिर्फ कंक्रीट का ढांचा है या विकास का प्रतीक?

