दुकानों पर GST अफसर की दस्तक, सरकारी गाड़ी में ‘कूल-कूल’ दरबार! शटर गिरे, लेकिन इंजन नहीं रुका”
“मोदी कहते है—ईंधन बचाइए…पर,अमलीपदर में सरकारी एसी बोला—पहले मैडम को ठंडक पहुंचाइए! ईंधन बचाने की सीख आखिर किसके लिए?”
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
अमलीपदर का बाजार उस समय अचानक बदल गया जब स्टेट GST विभाग की सरकारी गाड़ी बाजार में दाखिल हुई। कुछ ही मिनटों में कई दुकानों के शटर एक-एक कर गिरने लगे। ऐसा लग रहा था मानो बाजार में व्यापार नहीं, बल्कि टैक्स का सायरन बज गया हो। जो दुकानदार रोज ग्राहकों की राह देखते हैं, वे उस दिन सरकारी टीम की आहट सुनते ही दुकानें बंद करते दिखाई दिए।
लेकिन इस कार्रवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा किसी नोटिस की नहीं, बल्कि सरकारी गाड़ी के बाहर खड़े लोगों की निगाहों में कैद एक दूसरे दृश्य की रही।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार GST विभाग के कर्मचारी दुकानों के भीतर नोटिस देने और दस्तावेजों की जांच में व्यस्त थे, जबकि जीएसटी इंस्पेक्टर योगिता सरकारी वाहन के अंदर बैठी रहीं। स्थानीय लोगों का दावा है कि लगभग 25 मिनट तक वाहन का इंजन लगातार चालू रहा और एसी भी चलता रहा, जबकि कर्मचारी बाहर कार्रवाई कर रहे थे।
जब इस विषय में मौके पर मौजूद कर्मचारियों से पूछा गया कि गाड़ी बंद क्यों नहीं की गई, तो उनका जवाब था—”मैडम गाड़ी के अंदर हैं, इसलिए एसी चालू है।”
बाद में जब इस संबंध में जिला GST अधिकारी अवधेश यादव से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि संभव है मैडम किसी वरिष्ठ अधिकारी या डायरेक्टर से गोपनीय बातचीत कर रही हों। वास्तविक स्थिति वही बता सकती हैं।

हालांकि, मौके पर मौजूद कई लोगों का कहना है कि उन्होंने मैडम को फोन पर बातचीत करते नहीं देखा। इसी कारण यह सवाल गांव में चर्चा का विषय बन गया कि यदि कोई आवश्यक प्रशासनिक कारण नहीं था, तो सरकारी वाहन का इंजन और एसी इतने समय तक क्यों चालू रखा गया?
एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार ईंधन बचाने, ऊर्जा संरक्षण और सरकारी संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग का संदेश देते रहे हैं। उनके कार्यकाल में सरकारी काफिलों को सीमित करने और अनावश्यक खर्च कम करने पर भी जोर दिया गया। कई राज्यों में भी सरकारी वाहनों के सीमित उपयोग और ईंधन बचत को लेकर निर्देश जारी किए जाते रहे हैं।
ऐसे में अमलीपदर का यह दृश्य लोगों के बीच सवाल खड़े कर रहा है कि क्या ईंधन बचाने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों के लिए है, या सरकारी विभागों पर भी समान रूप से लागू होती है?
“सरकार कहती है—हर बूंद ईंधन कीमती है, लेकिन यहां नजारा ऐसा था मानो सरकारी डीजल नहीं, असीमित सुविधा का पास जारी हो गया हो।”
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
यदि सरकारी वाहन वास्तव में बिना आवश्यकता लंबे समय तक चालू रखा गया, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
दूसरों के रिकॉर्ड की जांच करने वाले विभागों के संसाधनों के उपयोग की निगरानी कौन करेगा?
जब सरकार जनता से ईंधन बचाने की अपील करती है, तो क्या वही अनुशासन सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी समान रूप से लागू नहीं होना चाहिए?
एक तरफ कम बिक्री से परेशान और सरकारी नियम कानून के लंबा लिस्ट से तंग आने वाले दुकानदार पसीना बहा रहे थे, तब दूसरी तरफ सरकारी गाड़ी में ठंडी हवा बह रही थी। लगता है नोटिस के साथ-साथ ‘विशेष एसी सेवा’ भी विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा बन गई है । प्रधानमंत्री मोदी जी के अपील मानने के लिए सिर्फ आम जनता ही आगे आएंगे या सरकारी कर्मचारी भी ? चाहे बात ईंधन बचाने का हो या सोना ना खरीदने की । आम जनता के तरफ से उठने वाले यह बड़ा सवाल का जवाब आखिर किसके पास है ?

