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बीजापुर खेल अकादमी विवाद: कोच को बचाने की कोशिश, पत्रकारों पर दबाव और गंभीर सवाल

बस्तर के माटी समाचार

बीजापुर, छत्तीसगढ़। जिले की खेल अकादमी में विवादित कोच सोपान द्वारा छात्राओं को रात में फिल्म दिखाने का मामला गहराता जा रहा है। घटना के बाद प्रशासनिक कार्रवाई और छात्राओं के बयानों में विरोधाभास ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, जबकि समाचारों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर मुकदमे की आशंका से मीडिया जगत में रोष है।

 

 

छात्राओं का प्रेस कॉन्फ्रेंस और सफाई मामले के प्रमुख बिंदु:

विवाद के बाद छात्राओं ने मीडिया को बुलाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने दावा किया कि वे **”अपनी मर्जी से”** फिल्म देखने गई थीं और कोच सोपान का कोई दोष नहीं है। हालाँकि, उनके बयान में असंगतताएँ थीं – कोच का नाम लेने में हिचकिचाहट और बातों को स्पष्ट रूप से न कह पाना।

गंभीर सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए खेल अकादमी प्रभारी या अन्य अधिकारियों से कोई **अनुमति ली गई थी?**

 

प्रशासन की विवादास्पद कार्रवाई पर भी सवाल

जिला प्रशासन ने घटना के बाद तत्काल **अधीक्षिका (छात्रावास अधीक्षिका) को हटा दिया**, जिसे एक “दिखावटी” कदम बताया जा रहा है। प्रशासन यह साबित करना चाहता है कि उसने गंभीर कार्रवाई की है।

अधीक्षिका का आरोप  है कि

छात्राओं ने उसकी बात नहीं मानी और कोच के कहने पर **जबरन फिल्म देखने गईं**, देर रात (लगभग 12:30 बजे) छात्रावास लौटीं।

कोच पर कार्रवाई न होने के कारण पर भी सवाल

आरोप है कि कोच सोपान पर इसलिए कार्रवाई नहीं हो रही क्योंकि बीजापुर जिले को **सॉफ्टबॉल के माध्यम से देश में पहचान दिलाने का श्रेय उसे जाता है।** आशंका जताई जा रही है कि खेल में अच्छे प्रदर्शन के नाम पर कोच को **”सुरक्षा कवच“** प्राप्त है, जिसके बल पर वह कुछ भी कर सकता है।

पत्रकारों पर दबाव और मुकदमे की धमकी

इस पूरे प्रकरण की रिपोर्टिंग करने वाले **पत्रकारों पर मुकदमा चलाने की कोशिश** की जा रही है। इससे स्थानीय मीडिया में गहरा रोष है। यह कदम **प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला** माना जा रहा है। सवाल उठाया जा रहा है कि प्रशासन का ध्यान समाचार प्रकाशित करने वालों को डराने पर क्यों है, जबकि मूल मुद्दा अकादमी में हुई अनियमितता और छात्राओं की सुरक्षा पर है?

 

कुछ सवाल हैं जिसका जवाब आप दर्शक दें

क्या खेल प्रशिक्षण के लिए छात्राओं को **रात में फिल्म दिखाना वास्तव में आवश्यक था?** उस फिल्म को देखने का खेल प्रदर्शन से क्या संबंध था? क्या इससे कोई वास्तविक लाभ हुआ?

सवाल यह भी है कि आदिवासी बहुल क्षेत्र की युवतियों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्रशासन और अकादमी प्रबंधन की कहाँ है?

*   क्या छात्राओं द्वारा दिया गया बयान वास्तव में स्वतंत्र और स्वैच्छिक था, या उन पर **कोच या प्रबंधन का दबाव** था?

 

बीजापुर खेल अकादमी का यह विवाद सिर्फ रात में फिल्म दिखाने तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक पारदर्शिता, छात्र सुरक्षा, कोचों की जवाबदेही और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मामला बन गया है। केवल एक अधीक्षिका को हटाना पर्याप्त नहीं है। जनता और मीडिया की मांग है कि:

विवादित कोच सोपान के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष जांच कर उचित कार्रवाई की जाए।

पत्रकारों पर मुकदमा चलाने की कोशिशों को तुरंत रोका जाए। छात्राओं द्वारा दिए गए बयान की स्वतंत्रता की जांच  हो।

खेल अकादमियों में छात्राओं की सुरक्षा और अनुशासन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए और लागू किए जाएं।

आदिवासी युवतियों के भविष्य और सुरक्षा से जुड़े इस मामले में गंभीरता और निष्पक्षता बरतना सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि सच्चाई को दबाने या दोषियों को बचाने की कोशिश।

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