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गंगालुर कन्या छात्रावास प्रकरण: गर्भावस्था की रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग के पास होने के दावे से मचा बवाल

स्वास्थ्य जांच कब और कैसे हुई? प्रशासन के सामने उठे कई अनुत्तरित प्रश्न

 

गंगालुर/ बीजापुर बस्तर के माटी :- नेताजी सुभाषचंद्र बोस कन्या हायर सेकेंडरी छात्रावास में छात्राओं के पांच माह से गर्भवती होने के सनसनीखेज मामले ने अब स्वास्थ्य विभाग को भी घेरना शुरू कर दिया है। सूत्रों के अनुसार इन छात्राओं की गर्भावस्था की पुष्टि करने वाली मेडिकल रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग के पास होने की जानकारी सामने आई है, जिससे पूरे प्रकरण ने एक नया और गंभीर मोड़ ले लिया है।

 

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन छात्राओं की स्वास्थ्य जांच कब हुई? किसके निर्देश पर यह जांच की गई? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि इस जांच के निष्कर्षों को सार्वजनिक होने में इतनी देरी क्यों हुई? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को देना होगा।

 

रात में सरकारी वाहन और जांच दल में महिला अधिकारियों की अनुपस्थिति

 

गौरतलब है कि मंगलवार की रात करीब 9 बजे तक जिला शिक्षा अधिकारी का शासकीय वाहन उस कन्या छात्रावास के सामने खड़ा देखा गया, जहां पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। इतना ही नहीं, जांच दल में एक भी महिला अधिकारी या कर्मचारी शामिल नहीं थी, जो संवेदनशील मामलों की जांच की बुनियादी आवश्यकता होती है।

 

रात के अंधेरे में जांच करने और उसमें भी महिला अधिकारियों की अनुपस्थिति ने प्रशासन के इरादों पर गंभीर संदेह पैदा कर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में पांच छात्राएं गर्भवती हैं, तो यह एक संवेदनशील मामला है और इसमें पीड़िताओं की गरिमा का ध्यान रखना सर्वोपरि होना चाहिए।

 

क्या सबूत जुटाने या सबूत छुपाने में लगा है विभाग?

सूत्रों की मानें तो जांच दल इस बात के सबूत जुटाने में लगा हुआ है कि शिक्षा विभाग ने समय पर कार्रवाई की और इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं हुई। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह जिम्मेदारी तय करने का अधिकार जांच दल को किसने दिया? क्या यह जांच पीड़ित छात्राओं के हित में हो रही है या फिर विभागीय फाइलों को साफ करने के लिए?

 

स्वास्थ्य विभाग की भूमिका संदेह के घेरे में

 

अब जब यह खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था की पुष्टि करने वाली रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग के पास है, तो यह जानना आवश्यक हो जाता है कि:

 

1. यह जांच कब हुई और किस डॉक्टर ने की?

2. जांच के बाद इसकी सूचना किसे दी गई?

3. क्या इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज कराई गई?

4. यदि नहीं, तो क्यों?

 

प्रशासन में मचा हड़कंप, मगर जवाब नहीं

 

इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद जिला प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है, लेकिन अभी तक किसी भी अधिकारी ने आधिकारिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। अधिकारियों की चुप्पी ने इस मामले में और भी रहस्य के बादल घनेरे हैं।

 

स्थानीय नागरिकों और महिला संगठनों ने मांग की है कि इस मामले की जांच महिला आयोग और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की देखरेख में की जाए, ताकि न केवल दोषियों को सजा मिल सके, बल्कि यह भी सुनिश्चित हो सके कि जांच प्रक्रिया में किसी प्रकार की मिलीभगत या सबूत छुपाने का प्रयास न हो।

 

यह मामला अब सिर्फ छात्राओं के गर्भवती होने का नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र, स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और कन्या छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्न बनकर खड़ा हो गया है।

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