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मैदान के नीचे सिंचाई विभाग का 42 एकड़ का तालाब या…….

एक ऐसा तालाब जो बाहन चालकों को करता है आकर्षित !

जलकुंभी के कब्जे से बेहाल हुआ सिंचाई विभाग का तालाब, ग्रामीणों को हो रही भारी परेशानी

संवाददाता राजीव लोचन बस्तर के माटी (BKM)

कोदोभाटा _अमलीपदर _ ग्राम के बीच स्थित ऐतिहासिक 42 एकड़ क्षेत्रफल का सिंचाई विभाग के अधीन तालाब आज बदहाल स्थिति में पहुंच चुका है। जलकुंभी के बढ़ते कब्जे ने इस विशाल तालाब को मैदान जैसा बना दिया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि अब केवल 150 से 200 स्क्वायर फीट ही पानी के लिए बचा है, जबकि बाकी पूरे तालाब पर जलकुंभी ने अपनी जड़ें जमा ली हैं। पानी से भरे इस तालाब का उपयोग न तो ग्रामीण कर पा रहे हैं और न ही मवेशियों को पानी मिल पा रहा है, जिससे ग्रामीणों में गहरी नाराजगी है।

तालाब या मैदान ? धोखा देकर ले रही जान !

आमपारा जाने के लिए कोई पक्की सड़क न होने के कारण आमपारा जाने वाले सभी राहगीर उक्त तालाब के किनारे से होते हुए तालाब के सरप्लस को पार कर पारा तक पहुंचते हैं । बारिश के दिनों में उक्त सर प्लस वाली जगह पर कमर भर पानी भी रहता है , जिस पर कर उनको अपनी मंजिल तक पहुंचना रहता है । तालाब पर जलकुंभी का ऐसा कब्जा हो गया है कि इसे देखने पर यह एक हरे भरे मैदान की तरह दिखाई देता है। इस भ्रम के कारण अब तक कई हादसे हो चुके हैं। कई बार वाहन चालक धोखा खाकर गाड़ी तालाब में उतार चुके हैं, जिससे गंभीर दुर्घटनाएं हुई हैं। बीते वर्षों में मवेशी भी जलकुंभी के कारण तालाब में फंसकर जान गंवा चुके हैं।

2 साल पहले मछली पकड़ने गए एक युवक की भी जलकुंभी के जाल में फंसने से मौत हो गई थी। हाल ही में उड़ीसा से आए दो युवक इस जलकुंभी से भरे तालाब में घुस गए थे। रात के 9 बजे गांव वालों ने कड़ी मशक्कत के बाद उनकी जान बचाई।

पंचायत से सिंचाई विभाग के पास जाने के बाद बिगड़ी स्थिति

ग्रामीणों के अनुसार, जब तक यह तालाब पंचायत के अधीन था, तब तक इसकी नियमित सफाई और देखरेख होती थी। लेकिन जब से तालाब की जिम्मेदारी सिंचाई विभाग को सौंपी गई है, तब से इसकी स्थिति लगातार बिगड़ती गई है। विभाग ने न तो तालाब की सफाई कराई और न ही जलकुंभी हटाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते पंचायत को फिर से तालाब की जिम्मेदारी नहीं दी गई, तो आने वाले वर्षों में यह तालाब पूरी तरह बेकार हो जाएगा। जलकुंभी के कारण तालाब से पानी निकालना भी कठिन हो गया है। लोग बाल्टी लेकर तालाब में जाते हैं और कुएं से पानी निकालने की तरह बाल्टी से पानी भरकर ले आते हैं।

मछली पालन पर पड़ा असर

इस तालाब का उपयोग मछली पालन के लिए भी किया जाता था। अमलीपदर की एक आदिवासी महिला समूह ने इस तालाब को दस साल के लिए लीज पर लिया था। लेकिन जलकुंभी के कब्जे के कारण पिछले तीन सालों से मछली पालन पूरी तरह से ठप है। मछली पालकों ने तालाब में मछली छोड़ने के बावजूद जलकुंभी के कारण उन्हें पकड़ना बंद कर दिया है।

समिति का कहना है कि अगर स्थिति ऐसी ही रही तो कोई भी समूह भविष्य में इस तालाब को लीज पर लेने के लिए तैयार नहीं होगा। इससे न सिर्फ ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि सरकारी राजस्व की हानि भी होगी।

क्षेत्र में पानी की किल्लत के बावजूद बेकार पड़ा तालाब

गर्मियों के दिनों में जब पूरे क्षेत्र में पानी की भारी किल्लत होती है, तब भी यह तालाब पानी से भरा रहता है। लेकिन जलकुंभी के कारण ग्रामीण इसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। तालाब से सीधे पानी निकालना अब असंभव हो गया है। ग्रामीणों को बाल्टी के सहारे पानी निकालना पड़ रहा है। मवेशियों को भी पानी के लिए दूर जाना पड़ रहा है।

ग्रामीणों की मांग: प्रशासन करे तत्काल सफाई अभियान

गांव के लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि इस ऐतिहासिक तालाब से जलकुंभी हटाने के लिए विशेष सफाई अभियान चलाया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते तालाब की सफाई नहीं हुई तो भविष्य में और भी गंभीर दुर्घटनाएं हो सकती हैं। इसके अलावा, मछली पालन से होने वाली आय और सिंचाई की सुविधा भी पूरी तरह बाधित हो जाएगी।

“यह तालाब हमारे गांव की जीवनरेखा है। अगर समय रहते जलकुंभी को नहीं हटाया गया तो न सिर्फ गांव के लोगों को नुकसान होगा, बल्कि मवेशियों और पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुंचेगी।” – स्थानीय नागरिक _बोधन नायक

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही तालाब की सफाई नहीं की गई तो वे आंदोलन करने पर मजबूर होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन कब इस गंभीर समस्या का समाधान करता है।

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