21 दिन से शिवलिंग का आलिंगन कर तप में लीन हैं वीरचंद्र नागेश — घुमरा पदर में श्रद्धा और आस्था का अनूठा उदाहरण
ना अन्न, ना जल — केवल शिव! घुमरा पदर में हठयोगी शिवभक्त का चमत्कारिक तप जारी
बस्तर की माटी न्यूज़(BKM NEWS NATIONAL ),गरियाबंद
हठयोग में डूबे शिवभक्त: घुमरा पदर के वीरचंद्र नागेश की 21 दिन से अनोखी साधना जारी
आस्था, तपस्या और दृढ़ निश्चय की मिसाल बने हैं घुमरा पदर गांव के निवासी वीरचंद्र नागेश, जो बीते 21 दिनों से घुमरा पदर स्थित शिव मंदिर में हठयोग में लीन हैं। उम्र लगभग 40 वर्ष के वीरचंद्र, पिता रघुनाथ नागेश, ने अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु शिवलिंग का आलिंगन कर एकांत साधना शुरू की है, जिसमें वे दिनभर बिना अन्न-जल के तप करते हैं और केवल एक बार संध्या में दूध ग्रहण करते हैं।
प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व, वह पास की नदी में स्नान कर अपनी साधना में बैठ जाते हैं। मंदिर का दरवाजा भी भीतर से ढंका रहता है, ताकि कोई बाहरी व्यवधान साधना में न पड़े। उनका मानना है कि जब तक स्वयं भगवान शिव दर्शन नहीं देंगे, तब तक वह इस योग का समापन नहीं करेंगे।
वीरचंद्र नागेश के इस तप में उनके परिवार और गांववाले भी सहभागी बनकर उन्हें बाहरी विघ्नों से बचा रहे हैं। मंदिर के बाहर परिजनों की ड्यूटी लगी है ताकि कोई व्यक्ति उन्हें स्पर्श न करे या बातचीत न करे — क्योंकि बीते वर्ष की साधना में बाहरी हस्तक्षेप के कारण उनका तप टूट गया था, जिससे वह और उनके परिवारजन आहत हुए थे।
इस बार वे और भी कठोर नियमों का पालन कर रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों से अपील की जा रही है कि मंदिर परिसर में भीड़ ना लगाएं, और वीरचंद्र से संवाद या स्पर्श न करें, ताकि उनकी साधना निर्विघ्न संपन्न हो सके।
ग्रामीणों का मानना है कि वीरचंद्र की यह भक्ति सनातन परंपरा की जीवंत मिसाल है — जहां ऋषि-मुनियों की साधना भूमि पर आज भी आध्यात्मिकता की गूंज सुनाई देती है। ऐसी साधनाएं इस बात को सिद्ध करती हैं कि भारतवर्ष की धार्मिक चेतना आज भी उतनी ही जीवित है जितनी सदियों पहले थी।

“यह कोई आम तप नहीं, बल्कि शिवभक्ति की पराकाष्ठा है,” — ऐसा कहना है मंदिर के पुजारी का। गांव में एक अलग ही माहौल बना हुआ है — श्रद्धा, शांति और संयम का।
इस तप की पूर्णता पर क्या होता है, यह तो समय बताएगा, लेकिन आज घुमरा पदर की भूमि एक बार फिर सनातनी परंपराओं के शिखर पर खड़ी है।
आधुनिकता के दौर में जब जीवन की गति तेज़ हो गई है, ऐसे में वीरचंद्र नागेश जैसे साधकों का हठयोग हमारी परंपराओं की ताकत और विश्वास की गहराई को पुनर्स्मरण कराता है।

