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स्कूल रसोइए को नक्सली बताकर मारने का पुलिस पर आरोप, परिवार और ग्रामीणों में रोष

 

**बीजापुर बस्तर के माटी समाचार, छत्तीसगढ़, 22 जून 2025:** गृहमंत्री अमित शाह के 2026 तक बस्तर से नक्सलवाद खत्म करने के दावे और पुलिस की लगातार “सफल” कार्रवाइयों के बीच, बीजापुर जिले में एक घटना ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक आदिवासी ग्रामीण, जो सरकारी स्कूल में रसोइया था, को पुलिस द्वारा नेशनल पार्क क्षेत्र में मारे गए सात माओवादियों में से एक बताया जा रहा है। उसके परिवार और ग्रामीणों का आरोप है कि उसे गलत तरीके से नक्सली बताकर पकड़ा गया और मार डाला गया।

10 जून 22025 नेशनल पार्क एरिया  के इरपागुट्टा जिला बीजापुर में मुठभेड़, पुलिस ने दावा किया कि उसने एक एनकाउंटर में सात माओवादियों को मार गिराया।

*   **विवादित पहचान:** मारे गए लोगों में से एक की पहचान पुलिस ने **महेश कुड़ियम** के रूप में की और उस पर 1 लाख रुपये का इनाम होने का दावा किया।

 

**परिवार और ग्रामीणों के आरोप:**

 

*   **रसोइया था महेश:** परिवार और ग्रामीणों का दावा है कि महेश कुड़ियम नक्सली नहीं, बल्कि **इरपा गुट्टा प्राथमिक शाला का रसोइया** था। वह पिछले कई वर्षों से स्कूल में ही काम कर रहा था।

*   **प्रधानाध्यापक ने किया पुष्टि:** स्कूल के प्रधानाध्यापक ने एक न्यूज़ चैनल को दिए बयान में महेश के स्कूल रसोइया होने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि महेश के पासबुक और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज़ इस बात के सबूत हैं।

*   **लकड़ी लेने गया था:** ग्रामीणों के अनुसार, घटना के दिन महेश बैलगाड़ी से लकड़ी लाने के लिए तालाब की ओर भैंस लेकर जंगल गया था। यह उसका नियमित काम था।

*   **पुलिस ने पकड़ा:** एक ग्रामीण ने भोपालपटनम से आते समय देखा कि पुलिस ने महेश को पकड़ लिया था। इसकी सूचना परिवार को दी गई।

*   **डर के मारे परिवार सामने नहीं आया:** परिजनों का कहना है कि पुलिस से पूछताछ करके या विरोध करके महेश को छुड़ाने की उनकी हिम्मत नहीं हुई। उसके बाद ही उन्हें उसकी मौत की खबर मिली।

 

**गंभीर सवाल:**

 

इस घटना ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं:

 

1.  **निर्दोष हत्या का आरोप:** अगर महेश वाकई एक सरकारी स्कूल का रसोइया था और लकड़ी लेने जंगल गया था, तो पुलिस ने उसे क्यों पकड़ा और क्यों मारा? क्या यह एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या का मामला है?

2.  **”1 लाख का नक्सली” का दावा:** पुलिस ने महेश को 1 लाख रुपये का नक्सली बताया। अगर वह इतना बड़ा माओवादी था, तो वह एक सरकारी स्कूल में खुलेआम रसोइया का काम कैसे कर रहा था? स्कूल प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?

3.  **पुलिस कार्रवाई पर सवाल:** यह घटना पुलिस की “सफल” कार्रवाइयों और बड़े माओवादियों को मार गिराने के दावों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाती है। क्या पुलिस दबाव में निर्दोषों को निशाना बना रही है?

4.  **परिवार का डर:** परिवार का पुलिस से सवाल करने में डर जाना, सुरक्षा बलों और आम आदिवासी जनता के बीच मौजूद अविश्वास और भय को दर्शाता है।

 

**पुलिस पक्ष:**

 

इस खबर के लिखे जाने तक, इस विशिष्ट आरोप पर पुलिस प्रशासन की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पुलिस आमतौर पर ऐसे मामलों में एनकाउंटर को जायज ठहराते हुए मारे गए लोगों के माओवादी होने का ही दावा करती है।

 

**निष्कर्ष:**

 

बीजापुर जिले में महेश कुड़ियम की मौत का मामला एक गंभीर विवाद बन गया है। स्कूल प्रशासन द्वारा उसके रसोइया होने की पुष्टि और परिवार व ग्रामीणों के आरोप, पुलिस के दावों पर संदेह पैदा करते हैं। यह घटना नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में मानवाधिकारों के संरक्षण और पुलिस कार्रवाइयों में पारदर्शिता व जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित करती है। महेश के परिवार और ग्रामीणों के गंभीर सवालों का जवाब देना पुलिस प्रशासन और प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी है।

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