पोला तिहार में गुड़िया–गुड्डा की अनोखी शादी: मथुरा गांव की सदियों पुरानी परंपरा
बचपन के खेल को हकीकत का रूप, पूरे भारत में अद्वितीय उत्सव
पोला तिहार पर उमंग और परंपरा का संगम
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS)
बचपन में हर बच्चा गुड्डा–गुड़िया की शादी रचाता है। लेकिन छत्तीसगढ़–ओडिशा की सीमा पर बसे मथुरा गांव में इस खेल को हकीकत का रूप दिया जाता है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाई जाती है, मानो सच में किसी दूल्हा–दुल्हन का विवाह हो रहा हो।

वैदिक रीति-रिवाज से लेकर दुल्हन की विदाई तक
मथुरा गांव में पोला तिहार के अवसर पर यह आयोजन किया जाता है। विवाह की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और कलश यात्रा से होती है। रस्में बिलकुल असली शादी की तरह निभाई जाती हैं—बरात निकलती है, बाजे बजते हैं, बाराती नाचते-गाते दुल्हन के घर पहुंचते हैं। वहां भजन, नाच-गाना और भोज का आयोजन होता है। इतना ही नहीं, दुल्हन की विदाई भी छोटे-से दहेज के साथ की जाती है।
खासियत – दूल्हा और दुल्हन दोनों ही लड़कियां
इस शादी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दूल्हा और दुल्हन दोनों ही भूमिकाएं कम उम्र की लड़कियां निभाती हैं। वे सजी-धजी दुल्हन और दूल्हे की तरह तैयार होकर विवाह की हर रस्म को निभाती हैं। आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग इसे देखने आते हैं। दूल्हा–दुल्हन को आशीर्वाद देते हैं और बच्चों की उमंगों में शामिल होकर गांव की परंपरा की सराहना करते हैं।

सीख और संदेश
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह विवाह केवल खेल नहीं बल्कि जीवन की असली शादी की तैयारी है। बच्चे इससे सीखते हैं कि विवाह में निभाई जाने वाली जिम्मेदारियां और रिश्तों की अहमियत क्या होती है। यह परंपरा बच्चों में सामाजिक मूल्यों और परिवार की संस्कृति को आत्मसात करने का एक अनोखा तरीका है।
लड़कों की अलग परंपरा
वहीं गांव के लड़के इस दिन नदी से मुर्रा–चना लाकर पहाड़ की चढ़ाई करते हैं और शाम को लौटते हैं। इसे साहस और परिश्रम का प्रतीक माना जाता है।
पूरे भारत में अद्वितीय परंपरा
मथुरा गांव का यह आयोजन पूरे भारत में अद्वितीय है। देशभर में कहीं और इस तरह की परंपरा नहीं निभाई जाती। यही कारण है कि यह गांव अपनी गुड़िया–गुड्डा की शादी और कई अनोखा परंपरा को निभाने के लिएके लिए प्रसिद्ध है।

चार–पांच घंटे तक चलने वाले इस विवाह में जहां बच्चों की मासूमियत झलकती है, वहीं समाज को संदेश भी मिलता है कि शादी केवल एक रस्म नहीं बल्कि जिम्मेदारी और संबंधों का बंधन है। मथुरा गांव की यह परंपरा सचमुच आने वाली पीढ़ियों के लिए सीख और प्रेरणा है।9

