पुष्पा 4 की फोटो लीक या कुछ और ?
बस्तर की माटी न्यूज़_ गरियाबंद
_ पुष्पा-स्टाइल तस्करी — नदी के बहाव पर सागौन का ‘सिनेमाई’ ले-जाना
उदंती से ओड़िशा तक फिल्मी स्टंट : लकड़ी तस्करों की नई तरकीब ने वन विभाग दंग,
सैटेलाइट भी चकमा? फाइलों में उलझा विभाग, तस्कर कर रहे सरेआम तस्करी
उदंती रेंज — पुष्पा मूवी के स्टंट को टक्कर देती हुई एक नई काली कला यहां की नदीयों में देखने को मिल रही है। तस्कर अब लकड़ी को काटकर नदी के बहाव में बाँधकर, उसके ऊपर खड़े होकर सीधे एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचा रहे हैं। यही वह अनोखी शैली है जिसे देख कर गांव वाले कह रहे हैं — “यह तो पुष्पा 3 जैसा स्टंट है “।

उत्तर और दक्षिण उदंती रेंज के तस्कर जंगल की कीमती सागौन को काटकर नदी में लट्ठा बनाकर इकट्ठा करते हैं। फिर उस पर खड़े होकर बहते पानी के सहारे सीमा पार कर उड़ीसा के गांवों तक पहुंचते हैं — बिलकुल फिल्मी सीन की तरह। स्थानीय लोग और वन विभाग दोनों हैरान हैं कि कैसे इतने दिनों से यह खेल चल रहा है और रेंज के नाक के नीचे से सागौन निकल जाता रहा।

वन विभाग के दावों की पोल भी खुलती दिखाई दे रही है। उच्च स्तरीय सैटेलाइट कैमरा के निगरानी की बातें अक्सर की जाती हैं, लेकिन यही सैटेलाइट कैमरा जब नदी के बहते लट्ठों को नहीं पकड़ पा रही तो कई सवाल खड़े हो जाते हैं। क्या सैटेलाइट को चकमा देना अब भी संभव है? यह प्रश्न सिर्फ स्थानीयों तक सीमित नहीं रहा — वन संरक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी उंगली उठी है।

बस्तर के माटी न्यूज़ टीम ने उदंती रेंज की डिप्टी रेंजर चंद्राबली ध्रुव से बातचीत की। उनका कहना था कि पतासाजी के लिए टीम लगा दी गई है और जल्द ही तस्करों पर कार्रवाई कर जब्ती की जाएगी। पर सवाल यह है कि इतनी कीमती लकड़ी काटने और ले जाने में कितनी गहरी साजिश होती है, और क्या बिलकुल हर बार जब्ती के बाद ही यही प्रक्रिया दोहराई जाएगी?
स्थानीय लोग गुस्से में हैं। वे कहते हैं कि फाइलों के पीछे बैठा प्रशासन और सराफत भरी नीतियाँ तस्करों के सामने नतमस्तक हो चुकी हैं। “तुम फाइल फाइल में उलझे रहो, हम फिल्मी स्टाइल में तस्करी करेंगे” — यही संदेश तस्करों की हरकतों से मिलता है। बिजली के खंभों या छोटे रास्तों के लिए हजारों एनओसी की मांग होती है, पर जंगलों में हजारों पेड़ों के कटने पर पूछा नहीं जाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि तस्कर लगातार अपने तरीके बदल रहे हैं — जो आज नदी के लट्ठे हैं, कल ड्रोन, फिर नए बंदोबस्त। और यही परिवर्तन वन विभाग की सावधानी पर भारी पड़ता है। सैटेलाइट को कारगर बनाने के लिए जमीन पर निगरानी, स्थानीय वार्डनों की टुकड़ियाँ और समुदाय आधारित सूचना तंत्र आवश्यक हैं। वरना तस्कर नए-नए ‘पुष्पा स्टाइल’ स्टॅट करते हुए आगे बढ़ेंगे।
यह मामला सिर्फ लकड़ी खोने का नहीं — यह संरक्षित टाइगर रिजर्व जैसे संवेदनशील इलाकों की सुरक्षा का भी सवाल है। उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व में रास्ता बनाने के नाम पर भी कई एनओसी की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, पर तस्करों की हरकतें दिखाती हैं कि सिस्टम या तो कमजोर है या फिर उसके कुछ हिस्से सहगामी हैं।
अब सवाल यही है : क्या वन विभाग अपनी फाइलों और दावों के बीच से उठ कर ठोस कार्रवाई करेगा, या तस्करों के ‘पुष्पा 3/4’ जैसे स्टॅट आने वाले दिनों में और मजबूत होते जाएंगे? ग्रामीणों की आशंका यही है कि अगर रोक नहीं लगी तो आने वाले वक्त में पुष्पा-स्टाइल तस्करी की लाइनें बढ़ेंगी और देश की प्राकृतिक विरासत नक़्शे से मिटती चली जाएगी।
जनता का क्रोध और मीडिया की लगातार निगाहें अब इस मुद्दे को बड़ा बना चुकी हैं। कुछ लोग तो यह कह रहे हैं कि पुष्पा फिल्म के डायरेक्टर और स्टॅट को देखकर तस्कर खुद को प्रशिक्षित कर रहे हैं — पुष्पा 3 आये भी नहीं और लोग पुष्पा 4, पुष्पा 5 जैसे ‘एडवांस’ स्टंट की बातें करने लगे हैं। अगर प्रशासन ने तुरंत रोकथाम नहीं की तो यह ‘सिनेमाई’ तस्करी लंबे समय तक चलने वाली महामारी बन सकती है।
उदंती के बहते पानी में छुपा हुआ यह ‘सिनेमाई’ तस्करी का अँधेरा अब सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सिस्टम पर गंभीर प्रश्न बन चुका है।

