बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS)गरयाबंद
डर के साए के बीच मना बच्चों के खुशियों के त्यौहार F L N मेला
जर्जर स्कूल में चिल्ड्रन्स डे: सरकार की उदासीनता ने बच्चों को मौत के साये में धकेला
_ कमार भुंजिया जनजाति के बच्चे दत्तक पुत्र, लेकिन स्कूल भवन के लिए तरसते क्यों?
मैनपुर ब्लॉक के कोतरा डांगरी प्राथमिक शाला में इस बार का चिल्ड्रन्स डे के दिन मनाए जाने वाले एफ.एल.एन. मेला बच्चों के लिए खुशी कम, भय ज्यादा लेकर आया। जहां पूरा देश पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती को बच्चों के उत्सव के रूप में मनाने में जुटा था, वहीं इस गांव के बच्चे जर्जर से अति–जर्जर हो चुके स्कूल भवन के नीचे कार्यक्रम मनाने को मजबूर रहे। सवाल यह है कि आखिर प्रशासन और जिम्मेदार विभाग कब तक इन मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ करते रहेंगे?

कोतरा डांगरी गांव, जहां निवास करती है कमार भुंजिया जनजाति,जिन्हें सरकार अपने दत्तक पुत्र कहती है वहां बच्चों का शिक्षा स्तर तो उम्मीद से कहीं बेहतर है, लेकिन स्कूल भवन की हालत बच्चों के भविष्य के साथ उनकी जान को भी जोखिम में डाल रही है। टूटती दीवारें, झूलता छत से बाहर निकला हुआ सरिया और लगातार गिरने का खतरा, यह सब रोज़मर्रा का हिस्सा बन चुका है। बच्चे डरते हुए पढ़ते हैं, माता–पिता सिहरते हुए उन्हें स्कूल भेजने से लेकर उनका सलामत वापसी और शिक्षक खुद भय के माहौल में कार्य करने को विवश हैं।
भीलवाड़ा जैसी घटनाओं के बाद भी अगर सरकार की आंखें नहीं खुल रही हैं, तो यह किसी बड़े हादसे की प्रतीक्षा ही कही जाएगी। माता-पिता हर दिन बच्चों के सुरक्षित लौटने की प्रार्थना करते हैं। क्या यही है सरकार का दुनिया को दिखाया जाने वाला “शिक्षा का मॉडल”? क्या बच्चों के जीवन से बड़ा कोई राजनीतिक कार्यक्रम है?
चार महीने पहले इसी स्कूल की स्थिति को लेकर दैनिक भास्कर में भी प्रमुख खबर प्रकाशित हुई, लेकिन विभागीय कुंभकर्णी नींद अब तक नहीं टूटी। फाइलें धूल खाती रहीं, निरीक्षण के नाम पर औपचारिकताएं निभती रहीं, लेकिन नतीजा वही—बच्चे आज भी मौत के साए में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
विडंबना यह है कि जहां कई सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिरा हुआ है, वहीं कोतरा डांगरी के बच्चे अपनी मेहनत, संस्कार और उत्साह से उम्मीद की एक मजबूत लौ जला रहे हैं। भोजनालय में ‘भोजन मंत्र’ का आदरपूर्वक पाठ यह साबित करता है कि इस गांव का संस्कार स्तर किसी भी मॉडल स्कूल से कम नहीं। शिक्षक भी अपनी पूरी निष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन क्या केवल संस्कार और उत्साह ही स्कूल चलाते हैं? क्या भवन नहीं चाहिए? क्या सुरक्षा नहीं चाहिए?

सरकार और विभाग के जिम्मेदारों से पूछा जाना चाहिए कि —
क्या दत्तक पुत्र होने के बावजूद इस जनजाति के बच्चों को एक सुरक्षित भवन भी नसीब नहीं?
क्या स्कूल भवन गिरकर कोई जान चली जाए, तभी फाइलें तेजी से चलेंगी?
किस वजह से पिछली खबर के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया?
क्या यह लापरवाही प्रशासनिक असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि अपराध की श्रेणी में नहीं आती?

चिल्ड्रन्स डे जैसे बच्चों की खुशी के दिन पर बच्चों को जर्जर भवन में कार्यक्रम मनाने के लिए भेजना, शासन की नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच गहरा अंतर दिखाता है। कोतरा डांगरी के बच्चे आज भी सवाल पूछ रहे हैं—
“हमारा स्कूल कब बनेगा?”
लेकिन दुख इस बात का है कि इस सवाल का जवाब देने के लिए न विभाग तैयार है, न सरकार।

क्या कहते हैं विकासखंड स्त्रोत समन्वयक शिव कुमार नांगे _सी.एम.स्कूल जतन योजना के अंतर्गत वहां पर कार्य स्वीकृत हुआ था जो निरस्त हो गया। पुनः स्वीकृति हेतु प्रस्ताव भेजा गया है ।
वही मैनपुर विकासखंड के शिक्षा अधिकारी महेश पटेल कहते हैं”मैं खुद इस स्कूल का निरीक्षण करूंगा और नए भवन हेतु आगे बात रखूंगा”
कोतरा डांगरी के ये मासूम सिर्फ एक स्कूल नहीं मांग रहे, वे अपना सुरक्षित भविष्य मांग रहे हैं। अब फैसला सरकार को करना है—
वह इन्हें बचाएगी या यूं ही खतरे के नीचे पढ़ने छोड़े रखेगी।

