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यात्री प्रतीक्षालय खुद कर रहा है सजने-संवरने की प्रतीक्षा

देवभोग–मैनपुर में यात्री प्रतीक्षालय बदहाली की तस्वीर, 6 लाख की लागत अब सवालों के घेरे में ।

बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS),गरियाबंद

देवभोग और मैनपुर ब्लॉक क्षेत्र के कई यात्री प्रतीक्षालय आज खुद अपने अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। जिन प्रतीक्षालयों का निर्माण यात्रियों को सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक इंतजार की सुविधा देने के लिए किया गया था, वही आज बदहाली, गंदगी और भ्रष्टाचार की जीती-जागती मिसाल बन चुके हैं।

प्रधानमंत्री–मुख्यमंत्री की तस्वीरें टूटी-फूटी, क्या यह जनप्रतिनिधियों और लोकतंत्र का अपमान नहीं?

शरदा पुर, गाड़ाघाट, उरमाल, इंदा गांव जैसे गांवों में वर्ष 2023 में विधायक निधि से बनाए गए यात्री प्रतीक्षालय महज दो साल में ही जर्जर अवस्था में पहुंच चुके हैं। कहीं छत से आजबेस्टर गायब है, तो कहीं फर्श में दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। बैठने की जगह टूट चुकी है और कई प्रतीक्षालय तो असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गए हैं।
सबसे गंभीर और चिंताजनक स्थिति उन बोर्डों की है, जिन पर देश के प्रधानमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों की तस्वीरें लगी हैं। ये तस्वीरें इतनी खराब हालत में हैं कि देखने वाले के मन में स्वतः आक्रोश पैदा हो जाता है। सवाल यह है कि क्या इस तरह टूटी-फूटी और गंदी अवस्था में नेताओं की तस्वीरें छोड़ देना उनका अपमान नहीं है? और क्या यह अपमान सिर्फ व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था का नहीं है?

भ्रष्टाचार, सिफारिश और लापरवाही का खामियाजा भुगत रही आम जनता

स्थानीय लोगों का कहना है कि हर पंचायत में बनने वाले इन यात्री प्रतीक्षालयों का निर्माण लगभग एक ही ठेकेदार द्वारा किया गया है। आरोप यह भी हैं कि उक्त ठेकेदार को यह काम राजनीतिक सिफारिश और संरक्षण के चलते मिला। सूत्रों से पता चला है कि तत्कालीन राज्य सरकार के एक प्रभावशाली मंत्री को महंगी मर्सिडीज गाड़ी भेंट कर पूरे राज्य में इस तरह के निर्माण कार्य हासिल किए गए। वहीं, निर्माण एजेंसी के रूप में बोर्ड पर ग्राम पंचायत का नाम लिखकर जिम्मेदारी नीचे थोप दी गई।

 

स्वच्छ भारत के दावे खोखले, प्रतीक्षालय बने शराबखोरी और जुए का अड्डा

यहीं से असली सवाल खड़ा होता है—क्या ग्राम पंचायत वाकई स्वतंत्र रूप से इन निर्माण कार्यों की गुणवत्ता तय कर रही थी, या फिर ऊपर से थोपे गए निर्णयों का पालन करने को मजबूर थी? यदि गुणवत्ता खराब है, तो जिम्मेदारी सिर्फ पंचायत की कैसे मानी जा सकती है? विभागीय निगरानी, तकनीकी स्वीकृति और भुगतान प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है।
स्वच्छ भारत अभियान की बात करें, तो इन प्रतीक्षालयों की हालत उस दावे की सच्चाई खुद बयां करती है। कई प्रतीक्षालयों में शराब की खाली बोतलें, ताश के पत्ते और गंदगी फैली हुई है। कहीं लोग बैठकर जुआ खेलते हैं, तो कहीं खुलेआम शराबखोरी होती है। सवाल यह भी है कि जब बच्चे और महिलाएं इन प्रतीक्षालयों का उपयोग करते हैं, तो उनके मन पर इसका क्या असर पड़ता होगा?

एक ठेकेदार पूरे राज्य में काम ग्राम पंचायत के नाम पर थोपे गए फैसले ?

एक और बड़ा मुद्दा है—प्रत्येक प्रतीक्षालय की लागत लगभग 6 लाख रुपये बताई गई है। अगर इतनी बड़ी राशि खर्च हुई है, तो दो साल में ही यह स्थिति कैसे बन गई? क्या सामग्री घटिया थी? क्या निर्माण में मानकों की अनदेखी हुई? और अगर ऐसा है, तो विभाग अब तक चुप क्यों है?
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई बार मीडिया में इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया, लेकिन न तो विभाग ने संज्ञान लिया और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर जाकर सुधार की पहल की। सवाल यह भी है कि क्या बड़े अधिकारी स्वयं संज्ञान लेकर इन टूटी तस्वीरों और जर्जर प्रतीक्षालयों को दुरुस्त नहीं कर सकते?

जिम्मेदार कौन—ग्राम पंचायत, विभाग या सत्ता के संरक्षण में पलता सिस्टम?

आज स्थिति यह है कि आम जनता, जो अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए प्रतीक्षालय में बैठकर इंतजार करती है, उसे टूटे-फूटे ढांचे और गंदगी के बीच समय बिताना पड़ रहा है। यात्री प्रतीक्षालय, जो सुविधा का प्रतीक होना चाहिए था, आज खुद सजने-संवरने की प्रतीक्षा कर रहा है।
अब देखना यह है कि जिम्मेदारी तय होगी या नहीं—क्या विभाग आगे आएगा, क्या जवाबदेही तय होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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