*मेगा खुलासा*
*बीजापुर में PMGSY का ‘कागजी विकास’ लगातार हो रहा उजागर*
*बीजापुर जिले में प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट में दस सालो से लग रही सेंध , 2000 करोड़ ₹ से ज्यादा की सड़कों में हुआ जमकर भरस्टाचार*
*10 साल का खेल: कागजों में सड़क, जमीन पर गायब — खबर के बाद टूटी पुलिया, सिस्टम कटघरे में*
*दस सालो में अधिकारी से लेकर इंजीनियर तक बदले पर सिस्टम नही बदला , पेटी ठेकेदारों के सहारे हो रहा घोटाले वाला कागजी विकास*
बीजापुर जिले में प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) में पिछले दस सालों से भारी सेंधमारी का मामला सामने आ रहा है। करीब 2000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बनी सड़कों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है, जहां कागजों में विकास दिखाया गया लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

बीजापुर में PMGSY का ‘कागजी विकास’ लगातार उजागर हो रहा है। 10 सालों से चल रहे इस खेल में कागजों में सड़कें बनीं, लेकिन जमीन पर वे या तो अधूरी हैं या पूरी तरह गायब हैं। हाल ही में खबर के बाद एक पुलिया को विभाग द्वारा खुद तोड़ना पड़ा, जिससे पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

दस सालों में अधिकारी बदलते रहे, इंजीनियर बदलते रहे, लेकिन सिस्टम नहीं बदला। पेटी ठेकेदारों के सहारे भ्रष्टाचार का यह खेल लगातार चलता रहा और कागजी विकास को बढ़ावा मिलता रहा।

बीजापुर जिले में PMGSY के तहत हुए कथित भ्रष्टाचार का अब एक संगठित चेहरा सामने आ रहा है। अलग-अलग मामलों को जोड़कर देखने पर स्पष्ट होता है कि विभागीय इंजीनियरों, ठेकेदारों और निगरानी तंत्र की मिलीभगत से करोड़ों रुपये की बंदरबांट की गई, जबकि जमीनी स्तर पर विकास नदारद रहा।

पिछले 10 वर्षों से ‘कागजी सड़क’ का खेल जारी है। EE, SDO और इंजीनियरों के स्तर पर लगातार अनियमितताएं सामने आई हैं। कागजों में सड़कें बनीं, लेकिन जमीन पर या तो अधूरी हैं या गायब। एलाइनमेंट बदलकर फर्जी भुगतान किया गया और अधूरे कार्यों को पूर्ण दिखाकर करोड़ों रुपये की निकासी की गई। जो भी अधिकारी आया, उसने इसी सिस्टम को आगे बढ़ाया और जनता के टैक्स के पैसे का जमकर दुरुपयोग हुआ।

*भ्रष्टाचार के कई उदाहरण सामने आए हैं—*
बीजापुर–भोपालपटनम नेशनल हाईवे से बंदेपारा जाने वाली सड़क का असली मार्ग बदलकर हाईवे के पास ही जोड़ दिया गया और गांव तक सड़क पहुंचे बिना ही उसे पूर्ण दिखाकर करोड़ों रुपये निकाल लिए गए।

पुतकेल–पटेलपारा सड़क (क्रमांक L061, पैकेज CG-17-238) को मई 2022 में पूर्ण घोषित किया गया, जबकि मौके पर सड़क का कोई अस्तित्व नहीं है। इस मामले में स्थानीय पत्रकारों द्वारा एफआईआर का आवेदन भी दिया गया, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

गलगम–भुसापुर सड़क में सिर्फ 2 किलोमीटर निर्माण किया गया, जबकि 7 किलोमीटर का भुगतान निकाल लिया गया। यहां तक कि सड़क की MB (मेजरमेंट बुक) तक गायब कर दी गई, लेकिन शिकायतों के बावजूद कोई जांच नहीं हुई।

पाताकुटरू से अबूझमाड़ के गुमनेर गांव को जोड़ने वाली 12 किलोमीटर सड़क का एलाइनमेंट बदल दिया गया, जिसकी लागत 4.14 करोड़ रुपये थी।
L100-T05 सड़क मंडीमरका गांव तक पहुंचने से पहले ही समाप्त हो गई, जबकि पुराने पुलिया को नया बताकर लाखों रुपये निकाले गए।
पोकरम से दुदुम सड़क केवल कागजों में बनाई गई और 54 लाख रुपये की निकासी कर ली गई।
तिम्मापुर से रेखापल्ली सड़क में साठगांठ कर अतिरिक्त राशि निकाली गई।
इसके अलावा कई सड़कों को गांव तक पहुंचने से पहले ही 0 किलोमीटर माइलस्टोन लगाकर पूर्ण दिखा दिया गया।

ताजा मामले में जिला मुख्यालय के पास गोरना – मनकेली सड़क में बनी एक पुलिया में भारी अनियमितता सामने आई, जहां सीमेंट कम और रेत ज्यादा इस्तेमाल की गई थी। मीडिया में खबर आने के बाद विभाग ने खुद पुलिया तोड़ दी, जो इस बात का प्रमाण है कि निर्माण घटिया था।

क्वालिटी कंट्रोल और जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सड़कों में खेत की काली मिट्टी का उपयोग किया गया, पुलियों में गिट्टी की जगह नदी के बोल्डर डाले गए और मटेरियल टेस्टिंग केवल कागजों में ही सीमित रही। NQM और SQM जांच भी औपचारिकता बनकर रह गई, जहां प्री-प्लान विजिट और वीआईपी ट्रीटमेंट के चलते जमीनी निरीक्षण नहीं हुआ।
*प्रशासनिक सिस्टम भी सवालों के घेरे में है*
जिले के शीर्ष अधिकारियों—कलेक्टर और जिला पंचायत CEO—का प्रभावी नियंत्रण नजर नहीं आया। इंजीनियर और ठेकेदार की मिलीभगत से धड़ल्ले से काम हुआ और पेटी ठेकेदारी के जरिए नियमों की अनदेखी की गई।
*अब सबसे बड़े सवाल खड़े होते हैं*—क्या इस 10 साल पुराने खेल की कभी निष्पक्ष जांच होगी?
क्या क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह फेल है या इसमें भी मिलीभगत है?
कितनी सड़कों और पुलियों में इसी तरह का घोटाला हुआ है? क्या हर कार्रवाई केवल खबर के बाद ही होगी?
बीजापुर में PMGSY का उद्देश्य गांवों को जोड़ना था, लेकिन आज भी कई गांव बदहाल सड़कों पर निर्भर हैं। कागजों में विकास दिखाया गया, जबकि जमीन पर भ्रष्टाचार हावी रहा।
रिकॉर्ड के अनुसार PMGSY के तहत अब तक 205 सड़कें बनाई जा चुकी हैं, लेकिन जांच केवल 23 सड़कों में ही क्यों की गई जबकि सभी सड़को में स्थिति इन 23 सड़कों की तरह ही है —यह भी एक बड़ा सवाल है।
*दस्तावेज़ों के अनुसार, कई सड़कों का निर्माण या तो अधूरा है… या जमीन पर उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है… लेकिन हैरानी की बात ये है कि इन सड़कों का लाखों से लेकर करोड़ों तक का भुगतान पहले ही कर दिया गया है।*
*सूची में शामिल इन 23 सड़कों पर नजर डालें तो—*
बीरागुड़ा – बड़े सनकनपल्ली
➤ लंबाई: 5 किमी | भुगतान: 28.89 लाख
बासागुड़ा – डल्ला
➤ लंबाई: 12 किमी | भुगतान: 90.53 लाख
तररेम – चिन्नागेलूर
➤ लंबाई: 6 किमी | भुगतान: 28.50 लाख
तिमापुर रोड
➤ लंबाई: 6 किमी | भुगतान: 15.66 लाख
पामेड़ – टेकलर
➤ लंबाई: 7 किमी | भुगतान: 28.19 लाख
सिररकोटा रोड
➤ लंबाई: 4.50 किमी | भुगतान: 12.57 लाख
गुडनुगुर रोड
➤ लंबाई: 8 किमी | भुगतान: 20.64 लाख
कादुलनार रोड
➤ लंबाई: 15 किमी | भुगतान: 52.20 लाख
पदेडा – पेड्डाकोरमा
➤ लंबाई: 3 किमी | भुगतान: 2.87 लाख
चेरपाल – पदमुर
➤ लंबाई: 20 किमी | भुगतान: 1.62 करोड़
बारसूर पल्ली – गोडीयापारा कोशलनार
➤ लंबाई: 14 किमी | भुगतान: 1.04 करोड़
भैरमगढ़ बीजापुर रोड – बड़ेतुंगोली
➤ लंबाई: 8 किमी | भुगतान: 69.48 लाख
कुमडेर रोड
➤ लंबाई: 1.5 किमी | भुगतान: 8.46 लाख
तुशवाल रोड
➤ लंबाई: 13 किमी | भुगतान: 40.78 लाख
पोकरम – दुदुम
➤ लंबाई: 7 किमी | भुगतान: 38.42 लाख
मदपाल रोड
➤ लंबाई: 4.50 किमी | भुगतान: 51.30 लाख
गुदमा – एरामनगी
➤ लंबाई: 15 किमी | भुगतान: 1.28 करोड़
पीतेपाल – तमोड़ी
➤ लंबाई: 5 किमी | भुगतान: 46.69 लाख
बिरियाभूमि – एदेर
➤ लंबाई: 14 किमी | भुगतान: 8.39 लाख
पिटे तुंगोली रोड
➤ लंबाई: 13 किमी | भुगतान: 74.40 लाख
तिमापुर – रेखापल्ली
➤ लंबाई: 25 किमी | भुगतान: 1.76 करोड़
आवापल्ली – कोटापल्ली
➤ लंबाई: 27 किमी | भुगतान: 22 हजार
गलगम – भूसापुर
➤ लंबाई: 10.25 किमी | भुगतान: (एमबी गायब)
दस सालों में करीब 2000 करोड़ रुपये के इस घोटाले में ऊपर से नीचे तक साठगांठ की बात सामने आ रही है। नियमों को दरकिनार कर फर्जी जांच की गई और इस पूरे खेल में विभाग के अधिकारी, इंजीनियर, NQM, SQM और ऑडिट विभाग तक की मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने का बहाना बनाकर निगरानी की कमी का फायदा उठाया गया। दुर्गम इलाकों का हवाला देकर गुणवत्ता जांच से बचने और मनमानी निर्माण के आरोप भी सामने आए हैं।
बताया जा रहा है कि इस कथित भ्रष्टाचार से अर्जित काली कमाई को अधिकारियों और इंजीनियरों ने अपने रिश्तेदारों और परिवार के नाम पर निवेश किया। शहरों में आलीशान दुकानें, वीआईपी कॉलोनियों में बंगले, महंगी गाड़ियां और सोने-चांदी में निवेश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि PMGSY में पदस्थ रहे अधिकारियों और इंजीनियरों की संपत्तियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो पूरे मामले की परतें खुल सकती हैं।
*सवाल अब भी खड़ा है — क्या सिस्टम खुद सुधरेगा, या हर बार खबर का इंतजार होगा?*

