कागजों में स्वच्छ, जमीन पर संघर्ष — 80 साल की बेलमती रोज़ रेंगकर ढूंढती हैं ‘शौचालय’!”
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS)’
धारनी ढ़ोड़ा ग्राम पंचायत में स्वच्छता का ऐसा अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है कि कागजों में गांव “चमचमाता स्वर्ग” है… और जमीन पर “संघर्ष का लाइव शो” ।

इस शो की मुख्य किरदार हैं 80 वर्ष से अधिक उम्र की बेलमती यादव, जिनकी कमर झुक चुकी है, शरीर जवाब दे चुका है, लेकिन सरकारी दावे आज भी सीना तानकर खड़े हैं।
ओडीएफ प्लस का पोस्टर चमकदार ।हकीकत में शौचालय बना “स्टोर रूम”

सरकार कहती है — “हर घर शौचालय”…
हकीकत कहती है — “हर दिन 2 किलोमीटर का संघर्ष”!
बेलमती यादव को आज भी अपने दैनिक कार्य के लिए कंक्रीट से भरे रास्ते पर रेंगते हुए तालाब तक जाना पड़ता है। दोपहर की तपती धूप में यह यात्रा किसी तीर्थ से कम नहीं… फर्क बस इतना है कि यहाँ पुण्य नहीं, केवल पीड़ा मिलती है।
अब सवाल उठता है —क्या उनका घर स्वच्छ भारत मिशन से अछूता है?
अरे नहीं! उनके घर में भी शौचालय बना है…गांव के अन्य सभी के घरों में भी लगभग ₹12000 खर्च कर शौचालय बनाया गया है । बस इस्तेमाल के लिए नहीं, “सजावट” और “स्टोर रूम” के लिए! मैनपुर ब्लॉक का 80% शौचालय बनने के एक महीने के अंदर ही टूट गया है या तो अन्य कार्य में उपयोग हो रहा है लेकिन कागज और कलम में अभी भी कई गांव स्वच्छ भारत मिशन का “ब्रांड एंबेसडर” बना हुआ है । हर गांव के एंट्री गेट पर बड़े गर्व से लिखा है —
_“ODF प्लस गांव”, “गंदगी मुक्त गांव”
लेकिन अंदर घुसते ही लगता है — “ODF मतलब “Only Display for Files” लिखने और दिखने में अंतर साफ-साफ झलकता है ।
3:30 लाख के सामूहिक शौचालय में ताला बुजुर्ग महिला के लिए 2 किलोमीटर का “ओपन एयर रिजॉर्ट!”

सामूहिक शौचालयों की हालत तो और भी शानदार है —पूरे मैनपुर ब्लॉक में बनाए गए सामूहिक शौचालय में कहीं ताला लटका है,कहीं दरवाजा गायब है,कहीं सीट ही “स्वच्छता के साथ गायब” हो चुकी है।
अंदर जाइए तो ऐसा लगेगा जैसे किसी भूतिया कोठी में प्रवेश कर लिया हो, जहाँ झाड़ू शायद उद्घाटन के दिन ही आखिरी बार “मुंह दिखाई” दी थी।
सरकारी रिकॉर्ड कहता है —
_“लाखों खर्च हुए”
गांव वाले कहते हैं —
_ “कुछ भी नहीं बदला” सामूहिक शौचालय जाने के लिए रास्ता भी नहीं है ।
और सबसे दिलचस्प बात —
स्वच्छता का प्रचार मंचों पर इतना जोरदार है कि सुनकर लगता है भारत नहीं, “स्वर्ग लोक” का वर्णन हो रहा है।
लेकिन अगर कोई विदेशी पर्यटक गलती से इस गांव में घूम जाए,
तो वह शायद यही कहेगा — “स्वच्छ भारत मिशन नहीं, यह तो ‘स्वच्छ भ्रम मिशन’ है!” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महात्मा गांधी के सपनो को स्वच्छ भारत मिशन के कर्मचारियों के द्वारा ही कूचला जा रहा है जैसे दिया जलाने के बाद माचिस का हाल होता है । अपनी अपनी जेब में गर्म करने के बाद अपनी घर में खुशियों का दिया तो जला लेते हैं और बाद में गांव के लोगों को गंदगी में जीने के लिए बेबस छोड़ देते हैं ।
बेलमती यादव के दो बेटे हैं, खाना तो मिल जाता है…पर देखभाल? वो भी शायद सरकारी वादों की तरह — सिर्फ कागजों में!

स्वच्छ भारत मिशन या स्वच्छ कागज अभियान गांव में गंदगी,मंचों पर तालियां !
आज भी सवाल वही है —
_क्या स्वच्छता सिर्फ रिपोर्ट में रहेगी?
_ क्या योजनाएं सिर्फ फोटो और फाइलों तक सीमित रहेंगी?
_ या फिर कभी ऐसा दिन आएगा जब बेलमती यादव को 2 किलोमीटर रेंगकर नहीं जाना पड़ेगा?
फिलहाल तो गांव में सब कुछ पहले जैसा ही है —
लोग देखते हैं, दुख जताते हैं…
और फिर भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ जाते हैं। क्योंकि यहाँ समाधान नहीं मिलता…सिर्फ “संवेदनाओं का मौन शोक” मिलता है।

