नवापारा पंचायत भवन बना शिक्षा का त्रिवेणी संगम – एक ही छत के नीचे स्कूल, आंगनबाड़ी और पंचायत कार्यालय
बस्तर की माटी न्यूज़ (BKM NATIONAL NEWS), गरियाबंद
जेसे त्रिवेणी संगम में लोग अपने पापों को धोने के लिए डुबकी लगाते हैं, ठीक वैसे ही नवापारा पंचायत भवन में मासूम बच्चे अपने भविष्य की डुबकी लगा रहे हैं। फर्क बस इतना है कि संगम में डुबकी लगाने वाले लोग पवित्र होकर लौटते हैं, जबकि पंचायत भवन के इस “त्रिवेणी संगम” में पढ़ने वाले बच्चे अपने सपनों और अधिकारों को धीरे-धीरे डूबते देख रहे हैं। सवाल यह है – क्या इन मासूमों का भविष्य अंधकार से बाहर आकर उजालों में नहाएगा, या पंचायत भवन की चारदीवारी में ही हमेशा के लिए गुम हो जाएगा?

मैनपुर जनपद के नवापारा ग्राम पंचायत में बच्चों की पढ़ाई का हाल जानकर आपका दिल दहल जाएगा। पिछले दो साल से यहां शिक्षा और प्रशासन की तस्वीर ऐसी है जिसे देखकर “विकसित भारत” का सपना बेमानी लगता है।

नवापारा पंचायत भवन फिलहाल
प्राथमिक शाला, आंगनबाड़ी केंद्र और पंचायत कार्यालय – तीनों का संचालन एक ही छत के नीचे कर रहा है। एक ही बरामदे में कभी बच्चे पढ़ते हैं, तो कभी पंचायत की बैठकें होती हैं। वही बरामदा बच्चों की किलकारियों से गूंजता है जब आंगनबाड़ी का संचालन होता है।

बच्चों की सुरक्षा सवालों के घेरे में
स्कूल के प्रधानपाठक को यहां आए महज 5 महीने ही हुए हैं। उन्होंने सीमित संसाधनों में व्यवस्था संभालने की कोशिश की है, लेकिन समस्याएं विकराल हैं। भवन का मुख्य दरवाजा टूटा पड़ा है। बच्चों के लिए शौचालय की कोई सुविधा नहीं है। पीने का पानी उपलब्ध नहीं। खाना बनाने के लिए न तो बिजली है और न ही सुरक्षा प्रबंध। चूल्हा पंचायत भवन के बाहर खुले आसमान के नीचे जलाया जाता है। बच्चे मध्यान्ह भोजन पास के खेत के किनारे बैठकर करते हैं, जहां आसपास कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं।
“बच्चों को बाहर निकाल देते हैं”
पंचायत की बैठकों के दौरान बच्चों को बाहर भेज दिया जाता है। कई बार स्कूल, पंचायत और आंगनबाड़ी का कामकाज एक साथ चलता है। सोचिए, ऐसे वातावरण में बच्चे किस मनोस्थिति में पढ़ाई कर रहे होंगे।
भवन तो बना, लेकिन स्कूल अनदेखा
ग्राम पंचायत में ही एक और स्कूल का भवन ठेकेदार द्वारा दिसंबर में बनकर तैयार हो गया है, लेकिन नवापारा प्राथमिक शाला के बच्चों को आज भी पंचायत भवन में जैसे-तैसे समायोजित किया गया है। आखिर बच्चों के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ कौन कर रहा है?

बड़ा सवाल – जिम्मेदार कौन?
क्या इसी तरह बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिया जाएगा? क्या ऐसे हालात में पढ़ने वाले बच्चे अपने सपनों को पंख दे पाएंगे? और क्या यह हमारे “विकसित भारत” की ओर बढ़ता कदम कहा जा सकता है?
अब बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को इस दुर्दशा से निकालने की जिम्मेदारी कौन लेगा – पंचायत, शिक्षा विभाग या फिर प्रशासन?

