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बीजापुर जिले में कन्या आश्रम में छात्रा की मौत: तीन विभागों की लापरवाही पर सवाल । यह दुखद घटना सिर्फ एक बच्ची की जान नहीं गंवाती, बल्कि आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए बनी सरकारी योजनाओं और व्यवस्थाओं की पोल खोलती है।

**बीजापुर, छत्तीसगढ़ बस्तर के माटी समाचार

, सरकार द्वारा करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद, बीजापुर जिले के एक आश्रम छात्रावास में रहने वाली तीसरी कक्षा की एक आदिवासी छात्रा की इलाज के दौरान मौत हो गई। यह घटना शिक्षा, आदिवासी विकास और स्वास्थ्य विभाग की गंभीर लापरवाही और प्रणालीगत विफलताओं की ओर इशारा करती है।

घटनाक्रम: एक दर्दनाक कहानी
*प्रारंभिक लक्षण व उपेक्षा (30 जुलाई):** तोयनार आश्रम की छात्रा के चेहरे पर सूजन दिखी। उसे तोयनार उप-स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, लेकिन **डॉक्टर की अनुपस्थिति** के कारण सिर्फ मलेरिया जांच हुई, जो नेगेटिव आई।
**हालत बिगड़ना व अपर्याप्त जांच (31 जुलाई):** अगले दिन सूजन बढ़ी और सांस लेने में तकलीफ होने पर छात्रावास अधीक्षिका ने उसे अपने पति के निजी वाहन से बीजापुर जिला अस्पताल पहुंचाया। वहां खून-पेशाब की जांच हुई और रिपोर्ट “सामान्य” बताकर उसे वापस आश्रम भेज दिया गया।
**पेट दर्द, भर्ती और मौत (1 अगस्त):** आश्रम लौटने पर छात्रा को तेज पेट दर्द हुआ। उसे दोबारा जिला अस्पताल ले जाया गया और भर्ती किया गया, जहां **इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई**।

विभागीय लापरवाही के गंभीर सवाल
* **स्वास्थ्य विभाग की विफलता:**
* तोयनार उप-स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर का न होना (जून-जुलाई में आश्रम खुलने के बावजूद)।
* गंभीर लक्षणों के बावजूद जिला अस्पताल में सतही जांच और “सामान्य” रिपोर्ट देना।
* समय पर सही निदान और इलाज न मिल पाना।
* **शिक्षा एवं आदिवासी विकास विभाग की जिम्मेदारी पर भी सवाल:**
* **प्रवेश के समय अनिवार्य स्वास्थ्य जांच न होना:** जुलाई में आश्रम खुलते ही पहले सप्ताह में सभी बच्चों की गहन स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होनी चाहिए थी। ऐसा होता तो पहले ही गंभीर समस्याओं का पता चल सकता था।
* **छात्रावास प्रबंधन में लापरवाही:** गंभीर हालत में भी समय पर उचित चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था न कर पाना। अधीक्षिका को निजी वाहन का सहारा लेना पड़ा।
* **बजट का प्रभावी उपयोग न होना:** सरकार द्वारा आवंटित करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं और निगरानी का अभाव।
* **पूर्व आदेश की अवहेलना:** जानकारी मिली है कि जिला प्रशासन ने पहले ही आश्रमों में बच्चों की स्वास्थ्य जांच के आदेश दिए थे, लेकिन तीनों विभागों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों में आक्रोश

छात्रा की अकाल मौत से परिवार और स्थानीय समुदाय में गहरा दुख और आक्रोश है। आदिवासी बच्चों के प्रति सरकारी व्यवस्था की उदासीनता और लापरवाही पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इससे पहले भोपालपटनम ब्लॉक में गर्भवती छात्रा का मामला भी विभागीय निगरानी की कमी को उजागर कर चुका है।

यह दुखद घटना सिर्फ एक बच्ची की जान नहीं गंवाती, बल्कि आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए बनी सरकारी योजनाओं और व्यवस्थाओं की पोल खोलती है। अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस मौत से सबक लेगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगी? देखना होगा।

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